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लघुत्व मूलं च किमर्थितैव
गुरुत्व बीजं यदयाचनं किम् ।
जातो हि को यस्य पुनर्न जन्म
को वा मृतो यस्य पुनर्न मृत्युः ॥
प्रश्नोत्तरी, आदि शङ्कराचार्य
प्रश्न – छोटेपन की जड़ क्या है ?
उत्तर– याचना , किसी के आगे हाथ फैलाना।
प्रश्न – बड़प्पन की जड़ क्या है ?
उत्तर –कुछ भी न माँगना, किसी के आगे हाथ न फैलाना।
प्रश्न – किसका जन्म सराहनीय है ?
उत्तर – जिसका पुनर्जन्म न हो ।
देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि।
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः।।
अर्थात् देहाभिमान (जडके साथ मैं-पन) सर्वथा मिट जानेपर जब परमात्मतत्त्वका बोध हो जाता है, तब जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहाँ-वहाँ परमात्मतत्त्वका अनुभव होता है अर्थात् उसकी अखण्ड समाधि (सहज समाधि) रहती है।
नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥
सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥
भावार्थ:-हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जाएगा?कृपानिधान श्री रामजी ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है॥
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥
भावार्थ:-शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं॥
ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥
दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥
भावार्थ:- ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है॥
अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥
कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥
भावार्थ:-निर्मल और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम, यम और (शौचादि) नियम- ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है॥
सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥
भावार्थ:- हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिए जीतने को कहीं शत्रु ही नहीं है॥
अण्डेषु पेशिषु तरुष्वविनिश्चितेषुप्राणो हि जीवमुपधावति तत्र तत्र ।सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्तेकूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्न: ॥
भागवत - श्रीमद्भागवतम् -11.3.39
इस भौतिक जगत में आत्मा कई जीव योनियों में जन्म लेता है। कुछ योनियाँ अंडों से उत्पन्न होती हैं, कुछ भ्रूण से, कुछ पौधों और वृक्षों के बीजों से तो कुछ स्वेद से उत्पन्न होती हैं। किन्तु समस्त योनियों में प्राण अपरिवर्तित रहता है और वह आत्मा के पीछे एक शरीर से दूसरे में चला जाता है।इसी प्रकार आत्मा विभिन्न जीवन-स्थितियों के बावजूद निरन्तर वही बना रहता है। हमें इसका व्यावहारिक अनुभव है। जब हम बिना स्वप्न देखे प्रगाढ़ निद्रा में होते हैं, तो भौतिक इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं, यहाँ तक कि मन तथा मिथ्या अहंकार भी निष्क्रिय हो जाते हैं,किन्तु जब मनुष्य जागता है, तो वह स्मरण करता है कि आत्मारूप वह शान्ति से सो रहा था, यद्यपि इन्द्रियाँ, मन और मिथ्या अहंकार निष्क्रिय थे।
अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ (महोपनिषद्, अध्याय ६, मंत्र ७१)
अर्थ - यह अपना मित्र है और यह नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।
अभिमानवतां ब्रह्मन् युक्तायुक्तविवेकिनाम्।
युज्यतेऽवश्यभोग्यानां दुःखानामप्रकाशनम्॥
परदुःखं समाकर्ण्य स्वभावसुजनो जनः।
उपकारसमर्थत्वात्प्रान्पोति हृदयव्यथाम्॥
राजतरंगिणी, प्रथम तरंग, २२६-२७
सबकी भलाई बुराई सोचने वाले स्वाभिमानी पुरुष अपना दुःख किसी के सन्मुख नहीं प्रकट करते।
दूसरों के दुःख सुन कर यदि सज्जन पुरुष मदद करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं, तो वे असीम हार्दिक वेदना का अनुभव करने लगते हैं अर्थात् स्वयं बहुत दुःखी हो जाते हैं।
‘वे स्वयं दुःखी हो लेते हैं किन्तु दूसरों को दुःखी नहीं देख पाते और हर प्रकार से मदद करने का प्रयत्न करते हैं।’
कबीरा मेरा कोई नही,हम काहू के नाही।
पारे पहुंची नाव ज्यों के बिछुरी जाहि॥
~न कोई मेरा है न हम किसी के है।जैसे नदीके पार नाव पहुंचजाने पर यात्री बिछूड जाते है,वैसे एकदिन सबसे बिछुड़ना होजायेगा।संसार किसी केलिए भीनही रुकता!यहाँसभीके बिनाकाम चलसकता है इससंसारको चलानेवाला परमात्मा है
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि ।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ता: परो हि योगो मनस: समाधि: ||
दान, अपने धर्म का पालन, नियम, यम, वेदाध्ययन, सत्कर्म और ब्रह्मचर्यादि श्रेष्ठ व्रत - इनका अंतिम फल है कि मन एकाग्र हो जाय। मन का समाहित हो जाना ही परम योग है।
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
पूर्ण ज्ञान, विज्ञान से सम्पन्न होने के कारण जिस मनुष्य के अन्दर यह परमोच्च चेतना जाग गयी है कि स्वयम्भू आत्मसत्ता ही, परम आत्मा ही स्वयं सभी भूत, सभी सत्ताएं या सम्भूतियां बना है, उस मनुष्य में फिर मोह कैसे होगा, शोक कहां से होगा जो सर्वत्र आत्मा की एकता ही देखता है।
BhagavadGita
अध्याय: ०४, श्र्लोक: २२
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥
वे जो अपने आप स्वतः प्राप्त हो जाए उसमें संतुष्ट रहते हैं, ईर्ष्या और द्वैत भाव से मुक्त रहते हैं, वे सफलता और असफलता दोनों में संतुलित रहते हैं, वे सभी प्रकार के कार्य करते हुए कर्म के बंधन में नहीं पड़ते।
विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्।।
कुन्तीजी भगवान से प्रार्थना करती हैं- ‘हे जगद्गुरो! हम पर सदा विपत्तियाँ ही आती रहें, क्योंकि आपके दर्शन विपत्ति में ही होते हैं और आपके दर्शन होने पर फिर इस संसार के दर्शन नहीं होते |
तमीश्र्वराणां परमं महेश्र्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् |
पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवेनशमीड्यम् ||
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्र्चाभ्यधिकश्र्च दृश्यते |
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ||
परमेश्र्वर समस्त नियन्ताओं के नियन्ता हैं और विभिन्न लोक पालकों में सबसे महान हैं | सभी उनके अधीन हैं | सारे जीवों को परमेश्र्वर से ही विशिष्ट शक्ति प्राप्त होती है, जीव स्वयं श्रेष्ठ नहीं है | वे सभी देवताओं द्वारा पूज्य हैं और समस्त संचालकों के भी संचालक हैं |
अतः वे समस्त भौतिक नेताओं तथा नियन्ताओं से बढ़कर हैं और सबों द्वारा आराध्य हैं | उनसे बढ़कर कोई नहीं है और वे ही समस्त कारणों के कारण हैं |
उनका शारीरिक स्वरूप सामान्य जीव जैसा नहीं होता | उनके शरीर तथा आत्मा में कोई अन्तर नहीं है | वे परम हैं | उनकी सारी इन्द्रियाँ दिव्य हैं | उनकी कोई भी इन्द्रिय अन्यकिसी इन्द्रिय का कार्य सम्पन्न कर सकती है| अतः न तो कोई उनसे बढ़कर है, न ही उनके तुल्य है |
उनकी शक्तियाँ बहुरुपिणी हैं, फलतः उनके सारे कार्य प्राकृतिक अनुक्रम केअनुसार सम्पन्न हो जाते हैं |” (श्र्वेताश्र्वतरउपनिषद् ६.७-८)
गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभिः सत्यवादिभिः |
अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धार्यते मही ॥
गाय, ब्राह्मण, वेद, सती स्त्री,सत्यवादी पुरुष, निर्लोभी, और दानी – इन सात की वजह से पृथ्वी टिकी हुई है ।
सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई।
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।।
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।।
जो छल छोड़कर और निष्काम होकर रामेश्वर के दर्शन करेंगे, उन्हें शंकर मेरी भक्ति देंगे और जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्र से तर जाएगा।
'धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी न करना, इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले।
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