naam mahima

राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा॥ 

जो लोग राम-राम कहकर जँभाई लेते हैं, अर्थात आलस्य से भी जिनके मुँह से राम-नाम का उच्चारण हो जाता है, पापों के समूह उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुह को तो स्वयं श्री रामचन्द्रजी ने हृदय से लगा लिया और कुल समेत इसे जगत्पावन (जगत को पवित्र करने वाला) बना दिया॥
राम त्वत्तोऽधिकं नाम इति मे निश्चिता मतिः। त्वयैका तारिताऽयोध्या नाम्ना तु भुवनत्रयम् ॥

प्रभो! आपका नाम तो आपसे बहुत ही श्रेष्ठ है, ऐसा मैं बुद्धि से निश्चयपूर्वक कहता हूँ, क्योंकि आपने तो केवल अयोध्यावासियों को तारा है, परंतु आपका नाम तो सदा-सर्वदा तीनों भुवनों को तारता ही रहता है।


चौपाई

काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही॥
नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया॥4॥

भावार्थ

जिसका श्री रघुनाथ जी के चरणों में अत्यंत प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते। हे पक्षीराज! नट (बाजीगर) का किया हुआ कपट चरित्र (इंद्रजाल) देखने वालों के लिए बड़ा विकट (दुर्गम) होता है, पर नट के सेवक (जंभूरे) को उसकी माया नहीं व्यापती॥4॥


राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर॥
परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥ 

श्री राम जी की भक्ति सुंदर चिंतामणि है। हे गरुड़ जी! यह जिसके हृदय में बसती है, वह दिन-रात स्वयं ही परम प्रकाश रूप रहता है। उसको दीपक, घी, बत्ती कुछ नहीं चाहिए, क्योंकि मणि का स्वाभाविक प्रकाश होता है। फिर किसी प्रकार की दरिद्रता समीप नहीं आती क्योंकि मणि स्वयं धनरूप है व तीसरे लोभ रूपी हवा उस मणिमय दीप को बुझा नहीं सकती क्योंकि मणि स्वयं प्रकाश रूप है व किसी दूसरे की सहायता से प्रकाश नहीं करती॥

चौपाई :
रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता॥
जासु चरन अज सिव अनुरागी। तासु द्रोहँ सुख चहसि अभागी॥2॥

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#अखंडरामायण 📕
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बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥ 


सीता जी का दुःख सुनकर सुख के धाम प्रभु के कमल नेत्रों में जल भरकर बोले- मन, वचन और शरीर से जिसे मेरी ही गति व मेरा ही आश्रय है, उसे क्या स्वप्न में भी कहीं विपत्ति हो सकती है?
तब हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु! विपत्ति तो वही (तभी) है जब आपका भजन-स्मरण न हो।


धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥

धर्म  से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्ष का देने वाला है- ऐसा वेदों ने वर्णन किया है।
और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देनेवाली है |


अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद॥
राम भजत सोइ मुकुति गोसाईं। अनइच्छित आवइ बरिआईं॥

संत, पुराण, वेद और शास्त्र यह कहते हैं कि कैवल्य रूप परमपद अत्यंत दुर्लभ है, किंतु हे गोसाईं! वही (अत्यंत दुर्लभ) मुक्ति श्री राम जी को भजने से बिना इच्छा किए भी जबर्दस्ती आ जाती है॥



“ श्रीहनुमानजीद्वारा तारकब्रह्मका उपदेश “

एक समय सनकादियो, ऋषियों और प्रह्लाद आदि महाभागवतोंने श्रीहनुमानजीसे पूछा-
हनुमानजी! आप यह बतलानेकी कृपा करें कि वेदादि शास्त्रों, पुराणों तथा स्मृतियों आदिमें ब्रह्मवादियोंके लिये कौन-सा तत्त्व उपदिष्ट हुआ है,

विष्णुके समस्त नामोंमें से तथा गणेश, सूर्य, शिव और शक्तिमें से तत्त्व कौन-सा है ?
हनुमानजी बोले–
आप संसारके बन्धनकानाश करनेवाली मेरी बातें सुनें । इन सब वेदादि शास्त्रोंमें परम तत्त्व ब्रह्मस्वरूप तारक ही है, राम ही परम ब्रह्म, राम ही परम तपःस्वरूप, राम ही परमतत्त्व हैं ।
१/३ 

भो योगीन्द्राश्चैव ऋषयो विष्णुभक्तास्तथैव च ।
शृणुध्वं मामकीं वाचं भवबन्धविनाशिनीम् ।।

 एतेषु चैव सर्वेषु तत्त्वं च ब्रह्मतारकम् ।
 राम एव परं ब्रह्म राम एव परं तपः ।।

 राम एव परं तत्त्वं श्रीरामो ब्रह्म तारकम् ।।
 (रामरहस्योपनिषद्)
(कल्याण पत्रिका;गीताप्रेस,)

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥ 

जो सगुण-साकार भगवान के उपासक हैं, दूसरे के हित में लगे रहते हैं, नीति और नियमों में दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणों के समान हैं॥




राम नाम जपि जीहं जन भए सुकृत सुखसालि|
तुलसी इहां जो आलसी गयो आजु की कालि||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि लोग जीभ से राम के नाम का जप करके पुण्यात्मा और सुखी-सम्पन्न हो गए, परंतु जो लोग इस राम-नाम जप में आलस्य करते हैं, उन्हें तो आज या कल नष्ट ही हुआ समझो|

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अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥
हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई॥ 

मृगतृष्णा के जल को पीने से भले ही प्यास बुझ जाए, खरगोश के सिर पर भले ही सींग निकल आवे, अन्धकार भले ही सूर्य का नाश कर दे, परंतु श्री राम से विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता॥ बर्फ से भले ही अग्नि प्रकट हो जाए (अनहोनी बातें हो जाएँ), परंतु श्रीराम से विमुख होकर कोई सुख नहीं पा सकता॥


अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।
जनम-जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥

मुझे न अर्थ की रुचि (इच्छा) है, न धर्म की, न काम की और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ। जन्म-जन्म में मेरा श्री रामजी के चरणों में प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं

"सत्वशुद्धिकरं नाम नाम ज्ञानप्रदं स्मृतम्।
मुमुक्षाणां मुक्तिप्रदं कामिनां सर्वकामदम्॥
~सचमुच,श्रीहरि का नाम मनुष्यों की शुद्धि करने वाला,ज्ञान प्रदान करने वाला,मुमुक्षुओं को मुक्ति देने वाला और इच्छुकों की सर्व मनोकामना पूर्ण करने वाला है।
ॐ भगवते वासुदेवाय नमः ॐ 🚩🙏 


रामहि सुमिरत रन भिरत, देत परत गुरु पायँ।

तुलसी जिन्हहि पुलक तनु, ते जग जीवत जाएँ॥

भगवान् श्रीराम का स्मरण होने के समय, धर्मयुद्ध में शत्रु से भिड़ने के समय, दान देते समय और श्री गुरु के चरणों में प्रणाम करते समय जिनके शरीर में विशेष हर्ष के कारण रोमांच नहीं होता, वे जगत में व्यर्थ ही जीते हैं।

स्रोत :
  • पुस्तक : दोहावली (पृष्ठ 25)
  •  
  • रचनाकार : तुलसीदास

मूक होइ बाचाल पंगु चढइ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन।। 

-जिनकी कृपा से गूँगा बहुत सुंदर बोलने वाला हो जाता है और लँगड़ा-लूला दुर्गम पहाड़ पर चढ़ने लायक हो जाता है, वे कलियुग के समस्त पापों विकारों को नष्ट करने वाले परम दयावान रामजी मुझपर दया करें।



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