bhakti

भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया॥
राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी॥ 

श्री रघुनाथजी भक्ति के विशेष अनुकूल रहते हैं। इसी से माया, भक्ति से अत्यंत डरती रहती है, जिसके हृदय में उपमारहित और उपाधिरहित विशुद्ध रामभक्ति सदा बिना किसी बाधा (रोक-टोक) के बसती है। उस भक्ति को देखकर माया सकुचा जाती है, पर वह अपनी प्रभुता नहीं चला सकती।

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥

ब्राह्मण, गो, देवता और संतों के लिए भगवान ने मनुष्य का अवतार लिया। वे  माया और उसके गुण और इंद्रियों से परे हैं। उनका  शरीर अपनी इच्छा से ही बना है॥

जौं प्रसन्न प्रभो मो पर नाथ दीन पर नेहु।
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु॥108 ख॥

भावार्थ

(ब्राह्मण ने कहा-) हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और हे नाथ! यदि इस दीन पर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणों की भक्ति देकर फिर दूसरा वर दीजिए॥108 (ख)॥


होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।।
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।। 
जो छल छोड़कर और निष्काम होकर रामेश्वर के दर्शन करेंगे, उन्हें शंकर मेरी भक्ति देंगे और जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्र से तर जाएगा। 


औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि।।
~भगवान राम 


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