bhakti

चौपाई

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।
सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥1॥

भावार्थ

कहो तो, भक्ति मार्ग में कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योग की आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवास की! (यहाँ इतना ही आवश्यक है कि) सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसी में सदा संतोष रखे॥1



कलियुग सम युग आन नहिं,जो नर कर विश्वास.

गाई राम गुणगन विमल,भवतर विनहिं प्रयास.


जिस भवसागर को पार करने के लिये सतयुग में ध्यान त्रेता में यग्य और द्वापर में पूजा जैसी कठिन मार्ग ही अबलम्बन था उसी भव सागर को पार करने के लिये कलियुग के मानवों को केवल रामनाम गुण रामकथा का श्रवण मनन-गायन के माध्यम से प्रभु ने सरल सुगम मार्ग प्रशस्त किया है.


यहि कलिकाल न साधन दूजा,योग यग्य जप तप व्रत पूजा.

रामहिं सुमिरिय गाईय रामहिं,संतत सुनिय रामगुण ग्रामहिं.


भक्ति के लिए भजनीय के सम्बन्ध में निश्चय होना चाहिए कि हमें किस की भक्ति करनी है।


'माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढ़ः सर्वतोऽधिकः । स्नेहो भक्ति - रितिख्याता तया मुक्तिर्न चान्यथा' ।


(ब्रह्मतर्क श्लोक, महाभा० ता० नि०१.८६ में उद्धृत) ।


जिसकी भक्ति करनी है, उसकी महिमा को पहले जानो

और उससे सर्वापेक्षा अधिक स्नेह करो। स्नेह माने हृदय की द्रुति, हृदय का पिघलना । हमारे हृदय में कोई कठोरता न रहे। जब हम हाथ में कोई चीज पकड़ते हैं और सोचते हैं कि यह गिर न जाय, इसे कोई छीन न ले, तो हमें अपनी मुट्ठी कड़ी रखनी पड़ती है।

इसी तरह जब हम अपने दिल में चाहते हैं कि वह छूट न जाय, गिर न जाय, कोई छीन न ले तो दिल को कड़ा करके उसको पकड़ना पड़ता है । जब भगवान् से प्रेम करना होता है तो चित्त में जो कठोरता है, उसको मिटाना पड़ता है। उसके लिए चाहिए स्नेह और जिसकी भक्ति करना चाहते हैं, उसकी महिमा का ज्ञान ।


#मानसगंगा

होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन,! 

हृदय बहुत दुख लाग जनम गय उ हरि भगति बिनु!! 



पुष्प के समान अत्यन्त सुकोमल अत्यन्त सौम्य ५ वर्ष की अवस्था वाले भक्तराज ध्रुवजी को जब श्रीमन्नारायण श्रीविग्रह का साक्षात्कार हुआ तो उनके नेत्रों से अश्रु की धारा प्रस्फुटित होने लगी...मैत्रेय जी कहते हैं -


"दृगभ्यां प्रपश्यन्प्रपिबन्निवार्भकश्चुम्बन्निवास्येन भुजैरिवाश्लिषन्" 

इस श्लोक की व्याख्या करते हुए अन्वितार्थकार कहते हैं -


ततश्च दृगभ्यां प्रपश्यन प्रपिबन्निव लक्षित:। आस्येन मुखेन चुम्बन्निव लक्षित:। भुजैरिवाश्लिषन्निव लक्षित:।


त्रिभुवन को मोहित करने वाले भगवान के दिव्य सौन्दर्य माधुर्य सम्पन्न श्रीविग्रह कोभक्तराज ध्रुव नेत्रों से ऐसे निहार रहे हैं मानो वे भगवान को अपने नेत्रों से ही पी जायेंगे...अपने मुख से मानो भगवान के श्रीविग्रह का चुम्बन कर लेंगे तथा अपनी दोनो भुजाओं से भगवान को अपने अङ्क (हृदय) में भर लेंगे।



प्रश्न- क्या संतान उत्पन्न किए बिना भी मनुष्य पितृऋण से छूट सकता है?


उत्तर - हां,छूट सकता है। जो भगवान के सर्वथा शरण हो जाता है ,उस पर कोई भी ऋण नहीं रहता


देवर्षिभूताप्तनृणां पितृृणां न किङ्करो नायमृणी च राजन्।

सर्वात्मना य: शरणं शरण्यं गतो मुकुंद परिहृत्य कर्तम्।


(श्रीमद्भा.) 



राजन! जो सारे कार्यों को छोड़कर संपूर्ण रूप से शरणागतवत्सल भगवान की शरण में आ जाता है , वह देव , ऋषि ,प्राणी,  कुटुंबी जन और पितृगण इनमें से किसी का भी ऋणी और सेवक नहीं रहता।


(साधन-सुधा-सिंधु)


 ~ परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदास जी महाराज ।


उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥ यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥

हे उमा! जिसने श्री रामजी का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती। यह स्वामी-सेवक का संवाद जिसके हृदय में आ गया, वही श्री रघुनाथजी के चरणों की भक्ति पा गया॥


नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥ सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥ -हे नाथ! मुझे अत्यंत सुख देने वाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिए। हनुमान जी की अत्यंत सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब प्रभु श्री रामचंद्रजी ने 'एवमस्तु' कह दिया॥


ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल। तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥

हे प्रभु! जिस पर आप प्रसन्न हों, उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभाव से रूई (जो स्वयं बहुत जल्दी जल जाने वाली वस्तु है) बड़वानल (संसार की सबसे भीषण अग्नि) को निश्चय ही जला सकती है (अर्थात् असंभव भी संभव हो सकता है)



सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा॥

करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखड़ महतारी॥ 

प्रभु बोले- हे मुनि! सुनो, मैं तुम्हें हर्षके साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझको ही भजते हैं, मैं सदा उनकी वैसे रखवाली करता हूँ, जैसे माता बालक की रक्षा करती है। छोटा बच्चा जब दौड़कर आग व साँप को पकड़ने जाता है, तो वहाँ माता उसे अपने हाथों अलग करके बचा लेती है॥


राम नाम कलि कामतरु राम भगति सुरधेनु।

सकल सुमंगल मूल जग गुरुपद पंकर रेनु॥


राम नाम कलि कामतरु सकल सुमंगल कंद। सुमिरत करतल सिद्धि सब पग पग परमानंद॥

कलियुग में रामनाम मनचाहा फल देने वाले कल्प वृक्ष के समान है, रामभक्ति मुँहमाँगी वस्तु देने वाली कामधेनु है, श्रीसद्गुरु के चरणकमल की रज संसार में सब प्रकार के मंगलों की जड़ है॥


श्रीराम का नाम कलियुग में कल्पवृक्ष के समान है और सब प्रकार के श्रेष्ठ मंगलों का परम सार है।रामनाम के स्मरण से ही सब सिद्धियाँ वैसे ही प्राप्त हो जाती हैं, जैसे कोई चीज हथेली में ही रखी हो और पद-पद पर परम आनन्द की प्राप्ति होती है॥

(तुलसीदास जी कृत दोहावली)


धर्म, ज्ञान और वैराग्य क्या है?

भगवान कहते हैं कि–

धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम्। 

गुणेष्वसंगे वैराग्यमैश्वर्य चाणिमादयः।। ( श्रीमद्भागवत महापुराण ११.१९.२७ )

'धर्मो मद्भक्तिकृत' - धर्म वही है जो हृदय में मेरी भक्ति उत्पन्न करे।

ज्ञानं चैकात्म्य दर्शनम्' - भूतमात्र में एक ही आत्मा व्याप्त है, ऐसा दर्शन ही ज्ञान है। 

'गुणेषु असंग वैराग्यम्' - प्रकृति के गुणों से असंगता ही वैराग्य है। 



बालकु बोलि दियो बलि कालको, कायर कोटि कुचालि चलाई।

पापी है बाप, बड़े परितापतें आपनि ओरतें खोरि न लाई॥

भूरि दई बिषमूरि, भईं प्रहलाद सुधाईं सुधाकी मलाई।

रामकृपाँ तुलसी जनको जग होत भलेको भलाई भलाई॥


कायर हिरण्यकशिपु ने करोड़ों कुचालें कीं और बालक प्रह्लादको बुलाकर कालको बलि दे दिया। पिता हिरण्यकशिपु बड़ा पापी था, उस दुष्टने प्रह्लादजीको कष्ट देनेमें अपनी ओरसे कोई कसर नहीं रखी। उसने बहुत सी विषमूलें दीं, किंतु प्रह्लादजीकी साधुतासे वे सब अमृत की मलाई बन गयीं।तुलसीदासजी कहते हैं- भगवान् राम की कृपासे संसारमें उनके साधु सेवक की सब प्रकार भलाई ही होती है।


चौपाई

भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया॥
राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी॥3॥

भावार्थ

श्री रघुनाथजी भक्ति के विशेष अनुकूल रहते हैं। इसी से माया उससे अत्यंत डरती रहती है। जिसके हृदय में उपमारहित और उपाधिरहित (विशुद्ध) रामभक्ति सदा बिना किसी बाधा (रोक-टोक) के बसती है,॥3॥



चौपाई

बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई॥
सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद॥6॥

भावार्थ

इस प्रकार सब रोगों से छूटकर जब मनुष्य निर्मल ज्ञान रूपी जल में स्नान कर लेता है, तब उसके हृदय में रामभक्ति छा रहती है। शिव जीब्रह्मा जीशुकदेव जी, सनकादि और नारद आदि ब्रह्मविचार में परम निपुण जो मुनि हैं,॥6॥


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