राम नाम जप की महत्ता – भक्त तुलसीदास जी दोहावली

राम नाम जप की महत्ता – भक्त तुलसीदास जी दोहावली

चित्रकूट सब दिन बसत प्रभु सिय लखन समेत|
राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत|| 

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि भगवान श्रीरामचंद्रजी श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मणजी के साथ चित्रकूट में हमेशा निवास करते हैं| राम-नाम का जप करने वाले को वे मनचाहा फल प्रदान करते हैं|प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि छ: मास तक केवल दुग्ध का आहार करके अथवा केवल फल खाकर राम-नाम का जप करो| ऐसा करने से हर प्रकार के सुमंगल ओर सब सिद्धियां करतलगत हो जाएंगी,  अर्थात अपने-आप ही मिल जाएंगी|

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार|
तुलसी भीतर बाहेरहूं जौं चाहसि उजिआर||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि तू अन्दर और बाहर दोनों तरफ ज्ञान का प्रकाश (लौकिक एवं पारमार्थिक ज्ञान) चाहता है तो मुखरूपी दरवाजे की दहलीज पर रामनामरूपी मणिदीप रख दे, अर्थात जीभ के द्वारा अखण्ड रूप से श्रीरामजी के नाम का जप करता रहे|

हियं निर्गुन नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम|
मनहुं पुरट संपुट लसत तुलसी ललित ललाम||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि ह्रदय में निर्गुण ब्रह्मा का ध्यान, नेत्रों के सम्मुख सगुण स्वरुप की सुंदर झांकी और जीभ से प्रभु का  सुंदर राम-नाम का जप करना| यह ऐसा है मानो सोने की सुंदर डिबिया में मनोहर रत्न सुशोभित  हो| ‘राम’ नाम निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान दोनों से बड़ा है| नाम की इसी महिमा को ध्यान में रखकर यहां नाम को रत्न कहा गया है तथा निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान को उस अमूल्य रत्न को सुरक्षित रखने के लिए सोने का संपुट (डिबिया के निचे-ऊपर के भाग को) बताया गया है|

सगुन ध्यान रूचि सरस नहिं जिर्गुन मन ते दुरि|
तुलसी सुमिरहु रामको नाम सजीवन मूरि||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि सगुण रूप के ध्यान में तो प्रीतियुक्त रूचि नहीं है और निर्गुण स्वरूप मन से दूर है| ऐसी स्थिति में रामनाम स्मरणरूपी संजीवनी बूटी का सदा सेवन करो|

एक छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ|
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी के नाम (राम) के दोनों अक्षरों में एक ‘र’ तो रेफ के रूप में सब वर्णों के मस्तक पर छत्र की भांति विराजता है और दूसरा ‘म’ अनुस्वार के रूप में सबके ऊपर मुकुट-मणि के समान विराजमान होता है|

नाम राम को अंक है सब साधन हैं सून|
अंक गएं कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचंद्रजी का नाम अंक है और सब साधन शून्य (०) हैं| अंक न रहने पर तो कुछ भी हाथ नहीं आता, परंतु शून्य के पहले अंक आने पर वे दस गुने हो जाते हैं, अर्थात राम-नाम के जप के साथ जो साधन होते हैं, वे दस गुना अधिक लाभदायक हो जाते हैं, परंतु राम-नाम के बिना जो साधन होता है वह किसी भी तरह का फल प्रदान नहीं करता|

नामु राम को कलपतरू कलि कल्यान निवासु|
जो सुमिरत भयो भांग तें तुलसी तुलसीदास||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि भगवान श्रीरामचंद्रजी का नाम इस कलियुग में कल्पवृक्ष अर्थात मनचाहा फल प्रदान करने वाला है और कल्याण का निवास अर्थात मुक्ति का घर है, जिसका स्मरण करने से तुलसीदास भांग से अर्थात विषय मद से भरी और दूसरों को भी विषयमद उपजाने वाली साधुओं द्वारा त्याज्य स्थिति से बदलकर तुलसी के समान निर्दोष, भगवान का प्यारा, सबका आदरणीय और जगत को पावन करने वाला हो गया|

राम नाम जपि जीहं जन भए सुकृत सुखसालि|
तुलसी इहां जो आलसी गयो आजु की कालि||


प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि लोग जीभ से राम के नाम का जप करके पुण्यात्मा और सुखी-सम्पन्न हो गए, परंतु जो लोग इस राम-नाम जप में आलस्य करते हैं, उन्हें तो आज या कल नष्ट ही हुआ समझो|

नाम गरीबनिवाज को राज देत जन जानि|
तुलसी मन परिहरत नहिं घुर बिनिआ की बानि||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि गरीबनिवाज अर्थात दीनबंधु भगवान श्रीराम का नाम ऐसा है, जो जपने वाले को भगवान का परम भक्त जानकर राज्य अर्थात प्रजापति का पद या मोक्ष-साम्राज्य तक दे डालता है, परंतु यह मन ऐसा अविश्वासी और नीच है कि कूड़े के ढेर में पड़े दाने चुगने की गंदी आदत नहीं छोड़ता, गंदे विषयों में ही सुख ढूंढता है|

कासीं बिधि बसि तनु तजें हठि तनु तजें प्रयाग|
तुलसी जो फल सो सुलभ राम नाम अनुराग||

तुलसीदासजी कहते हैं कि काशीजी में (पापों से बचते हुए) विधिवत् निवास करके शरीर त्यागने पर और तीर्थराज प्रयाग में हठ से शरीर छोड़ने पर जो मोक्षरुपी फल मिलता है, वह रामनाम में प्रीत होने से सरलता से मिल जाता है| (यही नहीं, प्रेमपूर्वक रामनाम के जप से तो मोक्ष के आधार साक्षात् भगवान की प्राप्ति हो जाती है)|

मिठो अरु कठवति भरो रौंताई अरु छेम|
स्वारथ परमारथ सुलभ राम नाम के प्रेम||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि – मीठा पदार्थ (अमृत) भी हो और कठौता भरकर मिले| राज्यादि अधिकार भी प्राप्त हों और क्षेमकुशल भी रहे अर्थात अभिमान और विषय-भागों से बचकर रहा जाए और स्वार्थ भी सधे तथा परमार्थ भी सम्पन्न हो, ऐसा होना बहुत ही कठिन है, परंतु श्रीराम नाम के प्रेम से ये परस्पर विरोधी दुलर्भ बातें भी सुलभ हो जाती हैं अर्थात रामनाम में प्रेम होने से सम्पूर्ण सुख भी मिलते हैं और वे दुःख से रहित होते हैं, राज्य भी मिल सकता है और उसमें अभिमान तथा विषयासक्ति का अभाव होने के कारण गिरने की भी गुंजाइश नहीं रहती, पारमार्थिक स्थिति पर अचल रहते हुए भी राजकार्य किया जा सकता है और परमार्थ ही स्वार्थ बन जाता है|

राम नाम सुमिरत सुजस भाजन भए कुजाति|
कुतरुक सुरपुर राजमग लहत भुवन बिख्याति||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि नीच जाति या दुष्ट स्वभाव वाले व्यक्ति भी भगवान राम के नाम का स्मरण मात्र करने से सुन्दर कीर्ति के पात्र हो गए|स्वर्ग के राजमार्ग (गंगाजी के तट) पर स्थित बुरे वृक्ष भी त्रिभुवन में ख्याति पा जाते हैं|

स्वारथ सुख सपनेहुं अगम परमारथ न प्रबेस|
राम नाम सुमिरत मिटहिं तुलसी कठिन कलेस||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि जिन लोगों को सांसारिक सुख स्वप्न में भी नहीं मिलते और परमार्थ में – मोक्ष-प्राप्ति के मार्ग में जिनका प्रवेश नहीं है, भगवान श्रीरामनाम का स्मरण करने से उनके भी सभी कठिन कलेश विकार मिट जाते हैं|

मोर मोर सब कहं कहसि तू को कहु निज नाम|
कै चुप साधहि सुनि समुझि कै तुलसी जपु राम||

तू सबको मेरा-मेरा कहता है, परंतु यह तो बता कि तू कौन है? और तेरा अपना नाम क्या है? अब या तो तू इसके नाम और रूप के रहस्य को सुन और समझकर चुप्पी साध ले, ‘मेरा-मेरा’ कहना छोड़कर अपने स्वरूप में स्थित हो जा या फिर प्रभु राम का नाम जप|

हम लखि लखहि हमार लखि हम हमार के बीच|
तुलसी अलखहि का लखहि राम नाम जप नीच||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी एक साधनहीन ‘अलखिया’ साधु जो केवल ‘अलख-अलख’ चिल्लाया करता था, उसे धिक्कारते हुए कहते हैं कि तू पहले स्वयं को जान, फिर अपने यथार्थ ‘अपने’ ब्रह्म के स्वरूप का अनुभव कर| उसके पश्चात और ब्रह्म के बीच में रहने वाली माया को पहचान|

अरे नीच! इन तीनों को समझे बिना तू उस अलख परमात्मा को क्या समझ सकता है? अत: ‘अलख-अलख’ चिल्लाना छोड़कर प्रभु के रामनाम का जप कर|

राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस|
बरषत बारिद बूंद गहि चाहत चढ़न अकास||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि जो भगवान राम के नाम का सहारा लिए बिना ही परमार्थ व मोक्ष की आशा करता है, वह तो मानो बरसते हुए बादल की बूंद को पकड़कर आकाश में चढ़ना चाहता है अर्थात जैसे वर्षा की बूंद को पकड़कर आकाश पर चढ़ना असंभव है, वैसे ही रामनाम का जप किए बिना परमार्थ की प्राप्ति असम्भव है|

तुलसी हठि हठि कहत नित चित सुनि हित करि मानि|
लाभ राम सुमिरन बड़ो बड़ी बिसारें हानि|


सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ|
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुण गाथ||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने तो शबरी, जटायु आदि अपने श्रेष्ठ सेवकों को ही सुगति दी परंतु रामनाम ने तो लाखों-करोडों दुष्टों का उद्धार कर दिया| प्रभु के ‘राम-नाम’ की यह गुण-गाथा वेदों में प्रसिद्ध है|

राम नाम पर नाम तें प्रीति प्रतीति भरोस|
सो तुलसी सुमिरत सकल सगुन सुमंगल कोस||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि जो रामनाम के अधीन है और रामनाम में ही जिसका प्रेम और विश्वास है, रामनाम का स्मरण करते ही वह सभी सद्गुणों और श्रेष्ठ मंगलों का खजाना बन जाता है|

लंक बिभीषन राज कपि पति मारुति खग मीच|
लही राम सों नाम रति चाहत तुलसी नीच||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचंद्रजी से विभीषण ने लंका पाई, सुग्रीव  ने राज्य प्राप्त किया, हनुमानजी ने सेवक की पदवी व प्रतिष्ठा पाई और पक्षी जटायु ने देवदुर्लभ उत्तम मृत्यु प्राप्त की, परंतु यह तुच्छ तुलसीदास तो उन प्रभु श्रीरामजी से केवल रामनाम में प्रेम ही चाहता है|

हरन अमंगल अघ अखिल करन सकल कल्याण|
रामनाम नित कहत हर गावत बेद पुरान||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि रामनाम सब अमंगलों और पापों को दूर करने वाला तथा सबका कल्याण करने वाला है| इसी से श्रीमहादेवजी सर्वदा श्रीरामनाम को रटते रहते हैं और वेद-पुराण भी इस नाम का ही गुण गाते हैं|

तुलसी प्रीति प्रतीति सों राम नाम जप जाग|
किएं होई बिधि दाहिनो देइ अभागेहि भाग||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रेम और विश्वास के साथ रामनाम जप रूपी यज्ञ करने से ईश्वर अनुकूल हो जाता है और अभागे मनुष्य को भी परम भाग्यवान बना देता है|

जल थल नभ गति अमित अति अग जग जीव अनेक|
तुलसी तो से दीन कहं राम नाम गति एक||

इस संसार में चर-अचर अनेक प्रकार के असंख्य जीव हैं| चरों में कुछ की जल में गति है, कुछ की पृथ्वी पर गति है और कुछ की आकाश में गति है, परंतु हे तुलसीदास ! तुझ जैसे दीन मनुष्य के लिए तो एकमात्र गति रामनाम है|

राम भरोसो राम बल राम नाम बिस्वास|
सुमिरत सुभ मंगल कुसल मांगत तुलसीदास||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि एकमात्र राम पर ही मेरा भरोसा रहे, राम ही का बल रहे और जिसके स्मरण मात्र से ही शुभ मंगल और कुशल की प्राप्ति होती है, उस रामनाम में ही विश्वास रहे|

राम नाम रति राम गति राम नाम बिस्वास|
सुमिरत सुभ मंगल कुसल दुहूं दिसि तुलसीदास||

प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसका रामनाम में प्रेम है, राम ही जिसकी एकमात्र गति है और रामनाम में ही जिसका विश्वास है, उसके लिए रामनाम का स्मरण करने से लोक-परलोक मंगल और कुशल है|

 राम त्वत्तोऽधिकं नाम इति मे निश्चिता मतिः। त्वयैका तारिताऽयोध्या नाम्ना तु भुवनत्रयम् ॥ 
प्रभो! आपका नाम तो आपसे बहुत ही श्रेष्ठ है, ऐसा मैं बुद्धि से निश्चयपूर्वक कहता हूँ, क्योंकि आपने तो केवल अयोध्यावासियों को तारा है, परंतु आपका नाम तो सदा-सर्वदा तीनों भुवनों को तारता ही रहता है।


राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥
रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥
सहित दोष दु:ख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥ 

रामजी ने एक अहिल्या को तारा, पर रामनाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि तार दी। राम ने एक ताड़का व सुबाहु को समाप्त किया, पर नाम अपने भक्तों के दोष, दुःख, दुराशाओं का ऐसे नाश करता है जैसे सूर्य रात्रि का। राम ने शिवधनुष तोड़ा पर रामनाम का प्रताप संसार के सर्वभय नाश कर देता है।
प्रभो! आपका नाम तो आपसे बहुत ही श्रेष्ठ है, ऐसा मैं बुद्धि से निश्चयपूर्वक कहता हूँ, क्योंकि आपने तो केवल अयोध्यावासियों को तारा है, परंतु आपका नाम तो सदा-सर्वदा तीनों भुवनों को तारता ही रहता है।
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