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पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥

अर्थात पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुएँ अच्छी होती हैं और न नयी होने से बुरी तथा हेय। विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूर्ख लोग दूसरों द्वारा बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं।

क्षणे रुष्टा: क्षणे तुष्टा: रुष्टे तुष्टे क्षणे क्षणे। 
अव्यवस्थित चित्तानाम् प्रसादोऽपि भयंकर:।। 

जिनका मन पल पल बदलता रहता है उनकी दोस्ती व उनसे बैर दोनों ही कष्टप्रद होते हैं । ऐसे लोगों से दूर के सम्बन्ध ही हितकर है ।

व्याघ्रः सेवति काननं च गहनं सिंहो गुहां सेवते
हंसः सेवति पद्मिनीं कुसुमितां गृधः श्मशानस्थलीम्।
साधुः सेवति साधुमेव सततं नीचोऽपि नीचं जनम्
या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते॥


अर्थात:- शेर घने जंगल में, और सिंह गुफा में रहता है; हंस विकसित कमलिनी के पास रहना पसंद करता है, गीध को श्मशान अच्छा लगता है । वैसे ही सज्जन, सज्जन की और नीच पुरुष नीच की सोहबत करता है; यानी की जन्मजात स्वभाव किसी से छूटता नहीं है ।


अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेदवेक्षया।
रक्षितं वर्द्धयेत।सम्यक् वृद्धं तीर्थेषु निक्षिपेत्॥
~जो प्राप्तनही होसका,उसे पानेकी इच्छाकरनी चाहिए,जो प्राप्त होचुका है उसकी देखभाल करना चाहिए,बचाए हुये(धन)को बढ़ाते हुए असक्षम व्यक्तियोंको देनाचाहिए।

दुराचारी दुरादृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः ।
यन्मैत्रीक्रियते पुम्भिर्नरःशीघ्रं विनश्यति ॥

जो व्यक्ति दुराचारी, कुदृष्टि वाले एवं बुरे स्थान पर रहनेवाले मनुष्य के साथ मित्रता करता है, वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।


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