विनय पत्रिका

दुष्ट विबुधारी-संघात, अपहरण महि-भार, अवतार कारण अनूपं।
अमल, अनवद्य, अद्वैत, निर्गुण, सगुण, ब्रह्म सुमिरामि नरभूप-रुपं॥

शेष श्रुति शारदा शंभु, नारद सनक गनत गुन, अंत नहिं तव चरित्रं।
सोइ राम कामारि, प्रिय अवधपति सर्वदा दासतुलसी-त्रास-निधि वहित्रं॥
देवताओंके शत्रु दुष्ट राक्षसोंके समूहका, जो पृथ्वीपर भाररुप था, संहार करनेके लिये अवतार लेनेमें उपमारहित कारणवाले, निर्मल, निर्दोष, अद्वैतरुप, वास्तवमें निर्गुण, मायाको साथ लेकर सगुण, परब्रह्म नररुप राजराजेश्वर श्रीरामका मैं स्मरण करता हूँ॥
शेषजी, वेद, सरस्वती, शिवजी, नारद और सनकादि सदा जिनके गुण गाते हैं, परंतु जिनकी लीलाका पार नहीं पा सकते, वही शिवजीके प्यारे अयोध्यानाथ श्रीराम इस तुलसीदासको दुःखरुपी समुद्र से पार उतारने के लिये सदा सर्वदा जहाजरुप हैं॥ (विनय पत्रिका)


जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा॥
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा॥
सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा॥
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अकिल अमोघसक्ति भगवंता॥
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता॥
निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा॥
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी॥
इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं॥

जो माया सारे जगत् को नचाती है और जिसका चरित्र (करनी) किसी ने नहीं लिख पाया गया, हे खगराज गरुड़जी! वही माया प्रभु श्री रामचंद्र जी की भृकुटी के इशारे पर अपने समाज (परिवार) सहित नटी की तरह नाचती है और श्री राम जी वही सच्चिदानंदघन हैं जो अजन्मे, विज्ञानस्वरूप, रूप और बल के धाम,

सर्वव्यापक एवं व्याप्य (सर्वरूप), अखंड, अनंत, संपूर्ण, अमोघशक्ति (जिसकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और छह ऐश्वर्यों से युक्त भगवान हैं॥ वे निर्गुण (माया के गुणों से रहित), महान, वाणी और इंद्रियों से परे, सब कुछ देखने वाले, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार, मोहरहित, नित्य,मायारहित, सुख की राशि,प्रकृति से परे, प्रभु (सर्वसमर्थ), सदा सबके हृदय में बसने वाले, इच्छारहित विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ (श्री राम में) मोह का कारण ही नहीं है। क्या अंधकार का समूह कभी सूर्य के सामने जा सकता है?॥4॥

दोहा :
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥119 क॥

भावार्थ

हे सर्पों के शत्रु गरुड़ जी! मैं सेवक हूँ और भगवान मेरे सेव्य (स्वामी) हैं, इस भाव के बिना संसार रूपी समुद्र से तरना नहीं हो सकता। ऐसा सिद्धांत विचारकर श्री रामचंद्र जी के चरण कमलों का भजन कीजिए॥119 (क)॥


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