मन
मन इस शरीर का राजा और सामान्य जीव अवस्था में नियंत्रणकर्ता है ।
इसीलिए मन को शेर कहते है यह अष्टदल कमल पर चक्कर काटता रहता है । और विषय विकारों में फ़ँसा होने के कारण एकाग्र नहीं होता
विकारों में प्रवृति होने के कारण यह जीव को भक्ति मार्ग की और मुङने नहीं देता,
और नाना प्रकार के पाप कर्मों में उलझाये रखता है ।
अष्टदल कमल की जिस पत्ती पर ये होता है । जीव को उसी के अनुसार कर्म में प्रवृत्त करता है
अष्टदल कमल की ये आठ पत्तिंया कृमश -------
1- काम
2- क्रोध
3- लोभ
4- मोह
5- मद (घमंड )
6- मत्सर (जलन)
7- ग्यान
8- वैराग हैं ।
मन शब्द प्रचलन में अवश्य है पर इसका वास्तविक नाम " अंतकरण " है ।
हमारे शरीर के अंदर पाँच तत्वों की पच्चीस प्रकृतियाँ ( एक तत्व की पाँच ) हैं । तो 25 प्रकृति + 5 ग्यानेन्द्रिया + 5 कर्मेंन्द्रियां + 5 तत्वों के शरीर का नियंत्रणकर्ता और राजा मन है
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मुझमे निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ। (वस्तु की प्राप्ति योग है और प्राप्त वस्तु की रक्षा क्षेम है, उनके ये दोनों कार्य मैं करता हूँ।) भगवद्गीता 9.22
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