राम

राम एव परं ब्रह्म राम एव परं तपः।
राम एव परं तत्त्वं श्री रामो ब्रह्म तारकम्॥
-श्री रामरहस्योपनिषद
(हनुमान जी का सनकादि, योगीन्द्र तथा प्रह्लाद जी को उपदेश)
रामस्य नाम रूपं च लीला धाम परात्परम् ।
एतच्चतुष्टयं सर्वं सच्चिदानन्दविग्रहम्।

रामका नाम , रूप , लीला और धाम - चारों ही परात्परस्वरूप हैं। भगवन्नाम स्वयंमें परात्पर परब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रह, सास  बभसससस है..!!

 दोहा :
जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल
सो कृपाल मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल॥124 क॥
जिनका नाम जन्म-मरण रूपी रोग की (अव्यर्थ) औषध और तीनों भयंकर पीड़ाओं (आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखों) को हरने वाला है, वे कृपालु श्री रामजी मुझ पर और आप पर सदा प्रसन्न रहें॥124 (क)॥
चौपाई
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥
नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥

भावार्थ-
राम ने भक्तों के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया, परंतु भक्तगण प्रेम के साथ नाम का जप करते हुए सहज ही में आनंद और कल्याण के घर हो जाते हैं।



राम एक तापस तिय तारी  

राम एक तापस 
चौपाई

राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥
रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥
सहित दोष दु:ख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥

भावार्थ-

राम ने एक तपस्वी की स्त्री (अहिल्या) को ही तारा, परंतु नाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि को सुधार दिया। राम ने ऋषि विश्वामित्र के हित के लिए एक सुकेतु यक्ष की कन्या ताड़का की सेना और पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति की; परंतु नाम अपने भक्तों के दोष, दुःख और दुराशाओं का इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रि का। राम ने तो स्वयं शिव के धनुष को तोड़ा, परंतु नाम का प्रताप ही संसार के सब भयों का नाश करने वाला है।


श्लोक

विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते॥122 ग॥

भावार्थ

मैं आपसे भली-भाँति निश्चित किया हुआ सिद्धांत कहता हूँ- मेरे वचन अन्यथा (मिथ्या) नहीं हैं कि जो मनुष्य श्री हरि का भजन करते हैं, वे अत्यंत दुस्तर संसार सागर को (सहज ही) पार कर जाते हैं॥122 (ग)॥


राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस।

बरषत बारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास।।  


जो रामनाम का सहारा लिए बिना ही परमार्थ की मोक्ष की आशा करता है, वह तो मानो बरसते हुए बादल की बूँद को पकड़कर आकाश में चढ़ना चाहता है.. अत: रामनाम का जप किये बिना परमार्थ की प्राप्ति असम्भव है.!


प्रभु सत्य करी प्रहलादगिरा, प्रगटे नरकेहरि खंभ महाँ। झषराज ग्रस्यो गजराजु, कृपा ततकाल बिलंबु कियो न तहाँ।


सुर साखिदै राखी है पांडुबधू पट लूटत कोटिक भूप जहाँ। तुलसी! भजु सोच-बिमोचनको, जनको पनु राम न राख्यो कहाँ।

भगवान् ने प्रह्लादके वचनको सत्य किया और महान् खम्भके बीच मे से नरसिंह रूप में प्रकट हुए। जब ग्राह ने गज को पकड़ा तो तत्काल ही कृपा की, तनिक विलम्ब नही किया । भरी सभा मे जिसका वस्त्र लूटा जा रहा था, उस द्रौपदी की देवताओं को साक्षी बनाकर रक्षा की।


गोसाईंजी अपने से ही कहते हैं कि 'अरे तुलसीदास! शोक से छुड़ाने वाले श्रीरामचन्द्र को भज, उन्होंने सेवक के प्रति अपने प्रण को कहाँ नहीं निबाहा /
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
जो एक बार भी मेरे शरण होकर यह कह देता है कि मैं तेरा हूँ, उसको मैं सर्वभूतों से अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है।
(वा० रा० 6। 18। 33)


चौपाई

कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही॥
प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ॥1॥

भावार्थ

तुझे काल कभी नहीं व्यापेगा। निरंतर मेरा स्मरण और भजन करते रहना। प्रभु के वचनामृत सुनकर मैं तृप्त नहीं होता था। मेरा शरीर पुलकित था और मन में मैं अत्यंत ही हर्षित हो रहा था॥1॥



अंहकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान।

मनुज बास सचराचर रुप राम भगवान्।।

शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चंद्रमा मन हैं और महान् (विष्णु) ही चित्त हैं। उन्हीं चराचर रूप भगवान राम ने मनुष्य रूप में निवास किया है॥


नामु अजामिल-से खल तारन, तारन बार-बारबधूको।

हरे प्रहलाद-विषाद, पिता-भय-साँसति-सागरु सूको॥


नामसों प्रीति-प्रतीति-बिहीन गिल्यो कलिकाल कराल, न चूको।

राखिहैं रामु सो जासु हिएँ तुलसी हुलसै बलु आखर दूको।


रामनाम अजामिल जैसे खलों को भी तारने वाला है, गज व वेश्या का भी निस्तार करनेवाला है। नामही ने प्रह्लादजी के विषाद का नाश किया, हिरण्यकशिपु के भय व साँसतरूपी समुद्र को सुखा दिया। रामनाम मे जिसकी प्रीति-प्रतीति नही है, उसको कराल कलिकाल निगल जाने मे कभी नही चूका। गोसाईजी कहते है जिनके हृदय में 'रा' और 'म' केवल इन दो अक्षरों का बल हुलसता है, उनकी रक्षा श्रीरामजी करेंगे॥


अंतरजामिहुतें बड़े बाहेरजामि हैं राम, जे नाम लियेतें।

धावत धेनु पेन्हाइ लवाई ज्यों बालक-बोलनि कान कियेतें॥


आपनि बूझि कहै तुलसी, कहिबेकी न बावरि बात बियेतें।

पैज परें प्रहलादहुको प्रगटे प्रभु पाहनतें, न हियेतें॥


बहिर्गत सगुणरूप भगवान् राम अन्तर्यामी निराकार ईश्वर से बड़े है, क्योंकि जिस प्रकार हाल की ब्यायी गौ अपने बच्चे का शब्द सुनते ही दूध उतार दौड़ी आती है, उसी प्रकार वे भी अपना नाम सुनकर दौड़े आते है। तुलसीदास तो अपनी समझ की बात कहता है,ऐसी बावली बाते दूसरे लोगों से कहे जानेयोग्य नहीं हुआ करतीं, प्रह्लाद के प्रतिज्ञा करने पर उसके लिये प्रभु पत्थर से ही प्रकट हो गये, हृदय से नहीं॥ (कवितावली १२९)



जड पंच मिलै जेहिं देह करी करनी लखु धीं धरनीधरकी।

जनकी कहु, क्यों करिहै न सँभार, जो सार करै सचराचरकी॥


तुलसी! कहु राम समान को आन है, सेवकि जासु रमा घरकी ।

जगमें गति जाहि जगत्पतिकी परवाह है ताहि कहा नरकी॥


जिसने पाँच जड़ तत्त्वो मिलाकर यह देह बनायी, जो चराचर की सँभाल करता है, अपने भक्तो की सँभाल क्यों न करेगा? हे तुलसी! भक्तो की रक्षा करने वाला बतलाओ तो रामजी के समान दूसरा कौन है, जिनकी किंकर लक्ष्मीजी है, और इस संसार मे जिसे उस जगत्पति का ही भरोसा है, वह मनुष्यकी क्या परवा करेगा?



The one who made this body by mixing the five inert elements, who takes care of the pastures, why won't he take care of his devotees?  Hey Tulsi!  Tell me the one who protects the devotees, then who else is like Ramji, whose kink is Lakshmiji, and in this world, who has faith only in that Jagatpati, how will he care about human beings?


हरन अमंगल अघ अखिल करन सकल कल्यान।
रामनाम नित कहत हर गावत बेद पुरान॥

रामनाम सब अमंगलों और पापोंको हरनेवाला तथा सब कल्याणों का करने वाला है। इसी से श्रीमहादेवजी सर्वदा श्रीरामनामको रटते रहते हैं और वेद-पुराण भी इस नामका ही गुण गाते हैं॥ [दो.३५]

Comments

Popular posts from this blog

धर्म के दश लक्षण (मनु के अनुसार)

शास्त्र

ब्राह्मण के नौ गुण क्या होते हैं