ब्रह्मा जी के द्वारा रामजी की स्तुति वा. रा. ६.११७.१३-१६
भवान् नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः।
एकशृङ्गो वराहस्त्वं भूतभव्यसपत्नजित्॥
अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव।
लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वक्सेनश्चतुर्भुजः॥
ब्रह्माजी बोले, हे रघुवीर आप चक्र धारण करने वाले भगवान् नारायण, एक दाढ़वाले पृथ्वीधारी वराह है, देवताओ के भूत-भावी शत्रुओ को जीतने वाले है।आप अविनाशी परब्रह्म है। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त मे सत्यरूप से विद्यमान हैं।आप ही लोको के परम धर्म, आप ही विष्वक्सेन, चार भुजाधारी श्रीहरि है॥
शार्ङ्गधन्वा हृषीकेशः पुरुषः पुरुषोत्तमः।
अजितः खड्गधृग् विष्णुः कृष्णश्चैव बृहद्बलः॥
सेनानीर्ग्रामणीश्च त्वं बुद्धिः सत्त्वं क्षमा दमः।
प्रभवश्चाप्ययश्च त्वमुपेन्द्रो मधुसूदनः॥
-आप ही शार्ङ्गधन्वा, हृषीकेश, अन्तर्यामी पुरुष और पुरुषोत्तम हैं।
आप किसीसे पराजित नहीं होते। आप नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले विष्णु एवं महाबली कृष्ण हैं॥ आप ही देव-सेनापति तथा गाँवोंके मुखिया - अथवा नेता हैं। आप ही बुद्धि, सत्त्व, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह तथा सृष्टि एवं प्रलयके कारण हैं। आप ही उपेन्द्र (वामन) और मधुसूदन हैं॥
वा. रा. ६.११७.१३-१६
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