Kavita vali
सहसभुज-मत्तगजराज-रनकेसरी परसुधर गर्बु जेहि देखि बीता॥
दास तुलसी समरसूर कोसलधनी, ख्याल हीं बालि बलसालि जीता।
रे कंत! तृन दंत गहि ’सरन श्रीरामु’ श्रीरामुकहि,
अजहुँ एहि भाँति लै सौंपु सीता॥
रे नीच! मारीचु बिचलाइ, हति ताड़का,
भंजि सिवचापु सुखु सबहि दीन्ह्यो।
सहस दसचारि खल सहित खर-दूषनहि,
पैठै जमधाम, तैं तउ न चीन्ह्यो॥
मैं जो कहौं, कंत ! सुनु मंतु भगवंतसों।
बिमुख ह्वै बालि फलु कौन लीन्ह्यो।
बीस भूज, दस सीस खीस गए तबहिं जब,
ईस के ईससों बैरु कीन्हो।
मन्दोदरी भयभीत होकर बोली- सहस्रबाहुरूपी मत्त गजराज के लिये रण मे केसरी समान परशुरामजी का गर्व जिन्हे देख चला गया, वे श्रीरामजी रणभूमि मे बड़े प्रबल है। देखो, उन्होने खेल मे बालि को जीत लिया। हे कन्त दाँतो मे तिनका दबा मै श्रीरामजीकी शरण हूँ, ऐसा कहते हुए जानकी को ले जाकर सौंप दो॥
अरे जिन्होंने मारीच को बिना फल के वाण से समुद्रके पार फेंका, ताड़का को मार डाला, शिवजी के धनुष को तोड़कर सबको सुख दिया। फिर, चौदह हजार राक्षसों सहित खर-दूषण को यमलोक भेजा, उसे तूने तब भी नहीं पहचाना! हे स्वामि! मेरी सलाह सुनो, भगवान् से विमुख होकर भला वालि ने कौन फल पाया?
तुम्हारे बीसों बाहु और दसों सिर तो तभी नष्ट हो गये जब तुमने शिवजी के स्वामी से वैर किया (कवितावली १८)
लग्यौ ललकि मुख कमल विलोकन, भूलि गई सुधि ग्राह ग्रसन की।
मनु रथ पै आवत दरसावत, भुज भूषित जन सिर परसन की।
फूल उपारि लपेटि सूँड़ सॉं, भेंट दियौ मनु भाव असन की।
मनि माला हलकत, उर झलकत, पीतांबर कटि फेंट कसन की।
'सूरस्याम' जन की प्रन राख्यौ, गज देख्यौ जहँ डर न खसन की॥
ग्राह से लड़ते लड़ते थककर गज ने जैसे ही प्रभु को याद किया, उसने देखा कि गरुड़ारूढ़ प्रभु बड़ी त्वरा मे उसी और आ रहे है, वेग के कारण उनका पीतांबर दुपट्टा हवा मे फर-फर उड़ रहा है। गजराज ललक कर, अत्यंत लालसा से, प्रभु का मुख कमल देखने लगा। वह भूल ही गया कि उसे ग्राह ने ग्रस लिया है।
उसको तो लगा मानो प्रभु रथ पर सवार होकर अपनी केयूर भूषित भुजा अपने भक्त के सिर पर रखने की कामना से युक्त, उस भुजा को दिखलाते हुए चले आ रहे है। तब गजराज ने अपनी सूँड में लपेट कर एक सनाल कमल उखाड़ लिया और नैवेद्य चढ़ाने की भावना से उसने उसे प्रभु को भेंट कर दिया।
प्रभु के वक्षस्थल पर मणियों की माला हिल रही थी कमर मे कसकर पीतांबर पहन रखा था, फेंटा बंधा था। पीतांबर की वह कसावट उनके वक्ष पर झलक रही थी। श्याम ने अपने भक्त का प्रण रखा, व पूरा किया। गजराज ने भी प्रभु के उन पादपद्यों को देखा, जहाँ से उसे फिर गिर जाने का कोई भय नहीं रह गया।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।
~श्रीमद् भगवद्गीता।9.26।
-जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त द्वारा प्रेम पूर्वक अर्पण किया हुआ वह सब मैं स्वीकार करता हूँ।
को भरिहै हरिके रितएँ, रितवै पुनि को, हरि जौं भरिहै।
उथपै तेहि को, जैहि रामु थपै, थपिहै तेहि को, हरि जौं टरिहै ॥
तुलसी यहु जानि हिएँ अपने सपनें नहिं कालहु तें डरिहै।
कुमयाँ कछु हानि न औरनकीं, जो पै जानकी नाथु मया करिहै ॥
जिसे भगवान् ने खाली कर दिया, उसे कौन भर सकता है व जिसको भगवान् भर देंगे, उसे कौन खाली कर सकता है। जिसे श्रीरामचन्द्रजी स्थापित कर देते हैं, उसे कौन उखाड़ सकता है और जिसे वे उखाड़ेंगे, उसे कौन स्थापित कर सकता है? तुलसीदास अपने हृदय मे यह जानकर स्वप्न में भी काल से भी नहीं डरता..
क्योंकि यदि जानकीनाथ श्री रामचंद्रजी कृपा करेंगे तो औरों की अकृपा से कुछ भी हानि नहीं है। (कवितावली ४७)
काढ़ि कृपान, कृपा, न कहूँ पितु काल कराल बिलोकि न भागे।
'राम कहाँ? 'सब ठाँउ है' 'खंभ में?' 'हाँ' सुनि हाँक नरकेहरि जागे।
बैरी विदारि भए बिकराल, कहे प्रहलादहि के अनुरागे।
प्रीति प्रतीति बढ़ी तुलसी तब तें सब पाहन पूजन लागे॥
हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के लिए तलवार निकाली और अपने पुत्र पर कुछ भी कृपा न की, परन्तु प्रह्लाद भयकर काल के समान अपने पिता को देखकर डरे नहीं। हिरण्यकश्यप ने पूछा, बता तेरा रक्षक राम कहाँ है? प्रह्लाद ने उत्तर दिया, मेरे रामजी तो सर्वत्र विराजमान हैं।
हिरण्यकश्यप ने पूछा, क्या इस (जिसमें प्रह्लाद को बाँधा था) खंबे में भी है? उसने उत्तर दिया, हाँ।
प्रहलाद की इस 'हाँ' को सुनते ही भगवान नरसिंह खंबा फाड़कर प्रकट हो गए व हिरण्यकश्यप को अपने नखो से विदीर्ण कर दिया, परन्तु प्रह्लाद की विनय से फिर भक्त के प्रेम के कारण शांत हो गए।तुलसीदास जी कहते हैं कि तब से भगवान् पर सबका प्रेम और विश्वास बढ़ गया, और इसी कारण तब से लोग पत्थरो में भी ईश्वर को पूजने लगे।
बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ।
उभय घरी महँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ॥
ऋक्षराज जाम्बवान कहे- मैं बूढ़ा हो गया। शरीर में पहले सा बल नहीं है। जब खरारि(खर के शत्रु श्रीराम) वामन बने थे, तब मैं जवान था व मुझमें बड़ा बल था॥ बलि के बांधते समय प्रभु इतने बढ़े कि उस शरीर का वर्णन नहीं हो सकता, किंतु मैंने दो घड़ी में दौड़कर(उस शरीर की)सात प्रदक्षिणाएँ कर ली
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।
यद्यपि प्रभु के अनेकों नाम हैं और वेद कहते हैं कि वे सब एक से एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ! रामनाम सब नामों से बढ़कर हो और पाप रूपी पक्षियों के समूह के लिए यह वधिक के समान हो
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