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षड् दोषाःपुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा तंद्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता॥

~अपना कल्याण एवं उन्नति चाहने वाले व्यक्ति को निद्रा,तंद्रा,भय,क्रोध,आलस्य और प्रमाद नामक अवगुणों को छोड़ देना चाहिए!
 षड् दोषाःपुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा तंद्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता॥
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणाम्नि द्रया कलहेन वा॥
~बुद्धिमानो कासमय काव्य शास्त्रके विनोद सेव्यतीत होता है,मूर्खोका समय व्यसन,निद्रा-कलह सेव्यतीत होता है
विदूर-नीति

दुर्जनेन समं वैरं प्रीतिं चापि न कारयेत्।
उष्णो दहति चाङ्गारश्शीत:कृष्णायते करम्।।
       (कवितामृतकूपम् --84)
       दुर्जन व्यक्ति के साथ न तो वैर करना चाहिए और न ही प्रीति।अंगारा यदि गर्म हो तो हाथ को जला देता है और यदि ठंढा हो तो हाथ को काला कर देता है।


पठतो नास्ति मूर्खत्वं अपनो नास्ति पातकम् ।
मौनिनः कलहो नास्ति न भयं चास्ति जाग्रतः ॥

भावार्थ : पढनेवाले को मूर्खत्व नहीं आता; जपनेवाले को पातक नहीं लगता; मौन रहनेवाले का झगड़ा नहीं होता; और जागृत रहनेवाले को भय नहीं होता।
यज्ञो नृतेन क्षरति तप: क्षरति विस्मयात ।
आयुर्विप्रापवादेन दानं च परिकीर्तनात् ।।

अर्थात:- झूठ बोलने से यज्ञ नष्ट हो जाता है, 
अभिमान से तपस्या नष्ट हो जाती है। 
ब्राम्हण की निन्दा करने से आयु का नाश 
होता है और कहने से दान नष्ट होता है।


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