तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः। न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह॥ जब मुझ सर्वात्माका साक्षात्कार हो जाता है, तब हृदयकी गाँठ टूट जाती है, उसके सारे संशय छिन्न हो जाते है। इसी से जो योगी मेरी भक्ति से युक्त व मेरे चिन्तन मे मग्न रहता है, उसके लिये ज्ञान अथवा वैराग्यकी आवश्यकता नहीं होती। उसका कल्याण तो प्रायः मेरी तो प्रायः मेरी भक्तिके द्वारा ही हो जाता है॥कर्म, तपस्या, ज्ञान, वैराग्य, योगाभ्यास, दान, धर्म व दूसरे कल्याणसाधनो से जो स्वर्ग, अपवर्ग, मेरा परमधाम या कोई भी वस्तु प्राप्त होती है,वह सब मेरा भक्त मेरे भक्तियोगके प्रभावसे, यदि चाहेतो, अनायास प्राप्त कर लेता है।(श्रीमद्भा११.२०.३१) कै तोहि लागहि राम प्रिय के तू प्रभु प्रिय होहि। दुइ में रुचै जो सुगम सो कीबे तुलसी तोहि।। (दोहावली ७८) अर्थात् योग यही है कि या तो श्रीरामजी हमे प्यारे लगे अथवा श्रीरामजी को हम प्रिय लगने लगे और यह दोनों भक्ति भक्तियोगसे ही सम्भव हैं।