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Showing posts from February, 2023

mantra & naam

https://youtu.be/BcNS9amCILk Naam ke liye shudh hone ki jrurat nhi he.  But mantra ke liye he. 

Surya mudra

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swarupe smaran aur mangal

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तुलसी सहित सनेह नित सुमिरहु सीता राम। सगुन सुमंगल सुभ सदा आदि मध्य परिनाम॥ तुलसीदासजी कहते हैं कि नित्य-निरन्तर भगवान् श्रीसीतारामजीके सुन्दर सगुण स्वरूपका प्रेमसहित स्मरण-ध्यान करते रहो; इससे आदि, मध्य और अन्तमें सदा ही अच्छे शकुन, परम मंगल और कल्याण होगा॥ अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥ कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥ भगवान के लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, नील कमल और तमाल के वृक्ष की तरह श्याम शरीर है, कमर में पीतांबर (पहने) और सुंदर तरकस कसे हुए हैं। दोनों हाथों में (क्रमशः) सुंदर धनुष और बाण हैं।

bhakti

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तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः। न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह॥ जब मुझ सर्वात्माका साक्षात्कार हो जाता है, तब हृदयकी गाँठ टूट जाती है, उसके सारे संशय छिन्न हो जाते है। इसी से जो योगी मेरी भक्ति से युक्त व मेरे चिन्तन मे मग्न रहता है, उसके लिये ज्ञान अथवा वैराग्यकी आवश्यकता नहीं होती। उसका कल्याण तो प्रायः मेरी तो प्रायः मेरी भक्तिके द्वारा ही हो जाता है॥कर्म, तपस्या, ज्ञान, वैराग्य, योगाभ्यास, दान, धर्म व दूसरे कल्याणसाधनो से जो स्वर्ग, अपवर्ग, मेरा परमधाम या कोई भी वस्तु प्राप्त होती है,वह सब मेरा भक्त मेरे भक्तियोगके प्रभावसे, यदि चाहेतो, अनायास प्राप्त कर लेता है।(श्रीमद्भा११.२०.३१) कै तोहि लागहि राम प्रिय के तू प्रभु प्रिय होहि। दुइ में रुचै जो सुगम सो कीबे तुलसी तोहि।। (दोहावली ७८) अर्थात् योग यही है कि या तो श्रीरामजी हमे प्यारे लगे अथवा श्रीरामजी को हम प्रिय लगने लगे और यह दोनों भक्ति भक्तियोगसे ही सम्भव हैं।

श्रीसीतारामजीके सुन्दर सगुण स्वरूपका प्रेमसहित स्मरण-ध्यान

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 तुलसी सहित सनेह नित सुमिरहु सीता राम। सगुन सुमंगल सुभ सदा आदि मध्य परिनाम॥ तुलसीदासजी कहते हैं कि नित्य-निरन्तर भगवान् श्रीसीतारामजीके सुन्दर सगुण स्वरूपका प्रेमसहित स्मरण-ध्यान करते रहो; इससे आदि, मध्य और अन्तमें सदा ही अच्छे शकुन, परम मंगल और कल्याण होगा॥ Tulsidasji says that keep remembering and meditating with love on the beautiful Sagun form of Lord Shri Sitaramji;  There will always be good omen, ultimate auspiciousness and welfare from this in the beginning, middle and end.

chinta

चिन्तनेनैधते चिन्ता त्विन्धनेनेव पावकः। नश्यत्यचिन्तनेनैव विनेन्धनमिवानलः।। (योगवासिष्ठ) अर्थात् 👉 ईंधन से जैसे अग्नि बढ़ती है, वैसे ही सोचने से चिन्ता बढ़ती है। न सोचने से चिन्ता वैसे ही नष्ट हो जाती है जैसे ईंधन के विना अग्नि।

श्री रामचरित मानस (उत्तरकाण्ड)

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https://hindi.webdunia.com/religion/religion/hindu/ramcharitmanas/UttarKand/7.htm श्री रामचरित मानस (उत्तरकाण्ड) - Ram Charit Manas (Uttarkand) in Hindi होम अमर कथा शिव कथायें महाशिवरात्री पूजा विधि एवं कथा सम्पूर्ण प्रदोष व्रत अन्य श्री रामचरित मानस (उत्तरकाण्ड) - Ram Charit Manas (Uttarkand) in Hindi- Page 3/12 नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ॥ अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही॥4॥ भावार्थ:- मैं घर की सब नीची से नीची सेवा करूँगा और आपके चरणकमलों को देख-देखकर भवसागर से तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे श्री रामजी के चरणों में गिर पड़े (और बोले-) हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिए। हे नाथ! अब यह न कहिए कि तू घर जा॥4॥ दोहा : अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव। प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव॥18 क॥ भावार्थ: -अंगद के विनम्र वचन सुनकर करुणा की सीमा प्रभु श्री रघुनाथजी ने उनको उठाकर हृदय से लगा लिया। प्रभु के नेत्र कमलों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया॥ 18 (क)॥ निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ। बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ॥18 ख॥ भावार्थ:- तब भगवान्‌ ने अपने ...

Gita 4.38

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas ।।4.38।। इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भली-भाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें पा लेता है। https://www.gurujimaharaj.com/shivpuran-hi/shivpuran-hi-section-4-chapter21-23.htm

Manas Ka marm

1. Naam 2. Gun  3. Kripa  Last do dohe ujjarkand