chinta

चिन्तनेनैधते चिन्ता त्विन्धनेनेव पावकः।
नश्यत्यचिन्तनेनैव विनेन्धनमिवानलः।।
(योगवासिष्ठ)
अर्थात् 👉 ईंधन से जैसे अग्नि बढ़ती है, वैसे ही सोचने से चिन्ता बढ़ती है। न सोचने से चिन्ता वैसे ही नष्ट हो जाती है जैसे ईंधन के विना अग्नि।

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