दोहवाली
सगुन ध्यान रुचि सरस नहिं निर्गुन मन ते दूरि।
तुलसी सुमिरहु रामको नाम सजीवन मूरि॥
- दोहवाली
सगुणरूप के ध्यान में तो प्रीतियुक्त रुचि नहीं है और निर्गुण मन से दूर है, समझ में नहीं आता। तुलसीदास महाराज कहते हैं कि ऐसी दशा में रामनाम-स्मरणरूपी संजीवनी बूटी का सदा सेवन करना चाहिए।
जानि राम सेवा सरस समुझि करब अनुमान।
पुरुषा ते सेवक भए हर ते भे हनुमान॥
श्रीरामजी की सेवा में परम आनन्द जानकर पितामह ब्रह्माजी सेवक (जाम्बवान्) बन गये और श्रीशिवजी हनुमान् जी हो गये। इस रहस्यको समझो और उनके प्रेम की महिमा का अनुमान लगाओ ॥ (दो.१४३)
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