संध्या वंदन क्यूँ करे?
संध्या वंदन क्यूँ करे?
ऋषयो दीर्घ सन्ध्यवाद् दीर्घमायुरवाप्नुयुः।
प्रज्ञां यशश्च कीर्तिश्च ब्रह्मवर्चसमेव च
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स्नान के पश्चात् सन्ध्यावन्दनादि का क्रम शास्त्रों में कहा गया है यह नित्य क्रिया है । इससे बड़ा लाभ है। रात्रि या दिन में जो भी अज्ञानकृत पाप होता है वह सन्ध्या के द्वारा नष्ट हो जाता है तथा अन्त:करण निर्मल, शुद्ध और पवित्र हो जाता है । सन्ध्या से दीर्घ आयु, प्रज्ञा, यश, कीर्ति तथा ब्रह्मतेज की प्राप्ति होती है । ॥ इस प्रकार हम शारीरिक शक्ति, बुद्धिबल, ब्रह्मतेज तथा यश की प्राप्ति भी इसके द्वारा होती है। नित्य सन्ध्या करने से ध्यान द्वारा हम परमात्मा से सम्पर्क स्थापित करते हैं। सन्ध्या में आचमन, मार्जन, प्राणायाम, अधमर्षण, उपस्थान आदि छाप में बड़ा रहस्य छिपा हुआ है और बड़े लाभ निहित हैं।परस्थ प्राणायाम के द्वारा रोग और पाप का नाश होता है।
सन्ध्या द्वारा हमें, शारीरिक शुद्धि, मानसिक शुद्धता और बौद्धिक प्रखरता और ब्रह्मवर्चस के साथ आध्यात्मिक शक्ति की प्राप्ति होती है। सन्ध्या के बाद गायत्री जप का विधान है। इससे बुद्धि को प्रेरणा मिलती है।
गायत्री वेदमाता है, यह बुद्धि को प्रेरणा देने वाली, तेज- स्वरूप ज्ञान प्रदायिनी है । इसके जप से बड़ी शक्ति प्राप्त होती है । लौकिक सिद्धियां भी गायत्री के अनुष्ठान से प्राप्त हो जाती हैं। गायत्री के समय उपासना तो हो ही जाती है । जिस प्रकार अग्नि में पड़ने से लोहा धीरे धीरे गरम हो जाता है उसी प्रकार गायत्री के दिव्य तेज को धारण करके साधक ब्रह्मतेज से परि- पूर्ण हो जाता है, उसके सारे कलुष विध्वंस हो जाते हैं,जिस प्रकार सूर्य की किरणें धूप में बैठे हुए व्यक्ति पर पड़ती हैं और धीरे धीरे उसकी उष्णता का प्रवेश उसमें होने लगता है उसी प्रकार गायत्री माता की ज्योतिर्मयी शक्ति और तेज साधक के शरीर, मन और बुद्धि पर पड़ता है
इस प्रकार सन्ध्या में कर्म, उपासना, ज्ञान, प्राणायाम, जप तथा ध्यान आदि की सभी क्रियायें सम्पन्न हो जाती हैं और नित्य का विधान होने से मनुष्य उसके द्वारा सभी लाभ उठा लेता है ।
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