नेत्र रोगों और चश्मे के बढ़ते नंबर को रोकने का अद्भुत और चमत्कारिक उपाय

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चाक्षुसी विद्या-

नेत्र रोगों और चश्मे के बढ़ते नंबर को रोकने का अद्भुत और चमत्कारिक उपाय

ज्योतिष दृष्टि से देखा जाए तो सूर्य, चंद्र, द्वितीय व द्वादश भाव, और इनके स्वामियों की स्थिति आदि से कुण्डली में नेत्र विकार देखे जाते हैं।
नेत्र विकारों में सबसे अधिक देखा जाता है नेत्र ज्योति का कम होना, आजकल तो छोटे छोटे बच्चे भी भारी भरकम नंबर का चश्मा लगाए नज़र आते हैं।
आज का ये विशेष प्रयोग नेत्र ज्योति को बढ़ाने और नेत्रों के अन्य रोगों के निवारण से संबंधित है।
कृष्णयजुर्वेदीय चक्षुषोपनिषद /चाक्षुषी विद्या का प्रयोग बताया गया है जिसके निरंतर प्रयोग से नेत्र रोगों साथ ही चश्मे के नंबर में भी सुधार देखा गया है।

25 जून को शुक्लपक्षीय रविवारीय सप्तमी है जिसे विजया सप्तमी भी कहते हैं आप इस दिन से शुरू करके नित्य चक्षुषोपनिषद का पाठ और इससे अभिमंत्रित जल लें, मैने अपने अनुभव में पाया है कि नित्य चाक्षुषी विद्या से अभिमंत्रित करके अगर एक छोटी आधाचम्मच/आवश्यकता अनुसार त्रिफलादि घृत लिया जाता है तो चश्मे के नंबर में सुधार और आँखों से संबंधित अन्य रोगों में भी आराम मिलता है।
नित्य सुबह सूर्य को अर्घ्य दें और चाक्षुषी विद्या के 11 पाठ  करके अभिमंत्रित त्रिफलाघृत/ जल का प्रयोग करें।

चाक्षुषोपनिषद(चाक्षुषी विद्या)

विनियोग – ॐ अस्याश्चाक्षुषी विद्याया अहिर्बुध्न्यऋषिः, गायत्री छन्दः, सूर्यो देवता, चक्षूरोग निवृत्तये विनियोगः।

ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरितं चक्षूरोगान् शमय शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय। यथा अहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय। कल्याणं कुरु कुरु। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय।

ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करुणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नमः। खेचराय नमः। महते नमः। रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवानञ्छुचिरूपः। हंसो भगवान शुचिरप्रतिरूपः।
य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति। ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।

॥ श्रीकृष्णयजुर्वेदीया चाक्षुषी विद्या॥

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