तारक-मन्त्र
मुमूषर्मणिकर्ण्य तु अर्धोदकनिवासिनः।
अहं ददामि ते मन्त्रं तारकं ब्रह्मदायकम्॥
मरने के समय मणिकर्णिका घाट पर गङ्गाजी में जिस मनुष्य का शरीर गङ्गाजल में पड़ा रहता है उसको मैं आपका तारक-मन्त्र देता हूँ, जिससे वह ब्रह्ममें लीन हो जाता है।
(पद्मपुराण, उ. खण्ड)
अतएव रामनाम काश्यां विश्वेश्वरः सदा।
स्वयं जप्त्वोपदिशति जन्तूनां मुक्तिहेतवे॥
संसारार्णवसंमग्नं नरं यस्तारयेन्मनुः।
स एव तारकस्त्वत्र राममन्त्रः प्रकथ्यते॥
(आनंद रामायण)
काशी में विश्वनाथ भगवान् शंकर निरन्तर 'राम' नाम का स्वयं जप करते हैं व प्राणियों की मुक्ति के लिये उन्हें राममन्त्र का उपदेश दिया करते हैं। संसाररूपी समुद्र में डूबे हुए मनुष्य को जो मन्त्र तार देता है, वही तारकमन्त्र राममन्त्र कहलाता है।
आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥
संसार में चार जाति के जीव हैं, काशी में मरने से सभी परम पद को प्राप्त करते हैं। हे मुनिराज! वह भी श्रीराम नाम की ही महिमा है, क्योंकि शिवजी दया करके काशी में मरने वाले को रामनाम का ही उपदेश करते हैं।
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत 'राम' कहि आवत नाहीं॥
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥
मुनिगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) (अनेकों प्रकार का) साधन करते रहते हैं। फिर भी अंतकाल में उन्हें 'राम' नहीं कह आता (मरते समय उनके मुख से राम नाम नहीं निकलता)। जिनके नाम के बल से शंकर जी काशी में सबको समान रूप से अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं॥
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