एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।277।

कोउ बिश्राम कि पव तात सहज संतोष बिनु।
चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।275।

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।276।

एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।
एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।277।

 जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास।
तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस।278।

https://youtu.be/gVs9I8lw3NQ

चातक तुलसी के मतें स्वातिहुँ पिऐ न पानि।
प्रेम तृषा बाढ़ति भली घटें घटैगी आनि।279।

रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग ।
तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रूचि रंग।280।


जो चेतन कह जड़ करइ, जड़हि करइ चैतन्य।

अस समर्थ रघुनाथ कहि, महिं जीव ते धन्य॥

जो चेतन को जड़ कर देते हैं और जड़ को चेतन, ऐसे समर्थ श्री रघुनाथ जी को जो जीव भजते हैं वे धन्य हैं।


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