दम्पतिके लिये यह श्रेष्ठ मंगल का घर है॥

 गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।  

जो वाणी और उसके अर्थ तथा जल और जल की लहर के समान कहने में अलग-अलग हैं, परन्तु वास्तव में अभिन्न हैं, उन श्री सीतारामजी के चरणों की मैं वंदना करता हूँ, जिन्हें दीन-दुःखी बहुत ही प्रिय हैं॥


 रमा रमापति गौरि हर सीता राम सनेहु।
दंपति हित संपति सकल, सगुन सुमंगल गेहु॥

श्रीलक्ष्मी-नारायण, गौरी-शंकर तथा सीता-राम में प्रेम समस्त सम्पत्ति देनेवाला है। दम्पतिके लिये यह श्रेष्ठ मंगल का घर है॥

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