सत्य सनातन का कीर्तन-विज्ञान

सत्य सनातन का कीर्तन-विज्ञान

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हमारे सनातन धर्म के ग्रन्थों में कीर्तन, जप एवं नामस्मरण की महिमा का बड़ा ही महत्वपूर्ण वर्णन है, विशेषकर इस कलि-काल जैसे विकराल समय के लिए इन्हें अचूक रामबाण कहा गया है।

यथा- 
मर्त्या अमर्तस्य ते भूरि नाम मनामहे ।
(ऋग्वेद ८।११।५)

तथा-
कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः । 
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंग: परं ब्रजेत् ॥ 
कृते यद् ध्यायतो विष्णु सेतायां यजतो मर्वः । 
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ॥ 
( श्रीमद् भाग० १२ । ३।५१-५२ ) 

अर्थात् 'राजन् ! दोषों के भण्डार इस कलियुग में यह एक महान् गुण है कि इसमें भगवान् का कीर्तन मात्र करने से ही पुरुष सब प्रकार की आसक्तियों से मुक्त होकर परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। सतयुग में विष्णु के ध्यान, त्रेता में यज्ञ तथा द्वापर में पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है वह सब कलियुग में श्रीहरि नाम कीर्तन से ही मिल जाता है ।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-

नहि कलि करमन भगति वियेकू । 
राम नाम अवलंबन एकू ॥

तथा-

कृतजुग सेवा द्वापर पूजा मख अरु जोग । 
जो गति होय सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ॥ 

श्री गीता जी में भी भगवान् श्री मुख से कहते हैं- 
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । 
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ।।

अर्थात् 'भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझे बार बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य भक्ति से मेरी उपासना करते हैं। इस प्रकार बहुत सी महिमा गायी गयी है। हमें आज कीर्तन एवं नामस्मरण से प्रत्यक्ष और शीघ्र लाभ क्यों नहीं होता, इस विषय पर विचार करना है ।

जो कार्य उसके मूल्य एवं महत्व को समझकर श्रद्धा तथा भावपूर्वक यथाविधि किया जाता है तथा उसके गुणों को जान कर किया जाता है वह कार्य शीघ्र तथा पूर्णरूपेण प्रतिफलित होता है और वह बिना श्रद्धा के बिना महत्व, गुण और तत्व को जाने विधिपूर्वक किए हुए कर्म से कहीं अधिक वीतर और श्रेष्ठ होता है में कहा गया है कि -

यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा
तदेव वीर्यवत्तरं भवति 
(छान्दोग्य १ ।१ १० )


तथा
अश्रद्धया दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । 
असदित्युण्यते पार्थं न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ 
(गीता १७।२८) 

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । 
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ।। 
(गीता १६।२३) 

अर्थात् जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्याग कर अपनी
इच्छा से वर्तता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है और न परम गति को तथा न सुख को ही प्राप्त होता है।

परन्तु कलिदोषसमूहसित आधुनिक लोगों में इस प्रकार की श्रद्धा, भावना तथा विधि का अभाव होने के कारण प्रत्यक्ष फल शीघ्र दृष्टिगोचर नहीं होता। यदि इस पर यह कहा जाय कि त तो कीर्तन करना व्यर्थ हैं तो यह ठीक नहीं है। 
गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने कहा है-

भाव कुभाव अनख आलसहूं । 
नाम जपत मंगल दिसि दसहूं । 
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । 
गावत नर पावहिं भवं थाहा ॥

अर्थात् भाव, कुभाव अनत्र एवं आलस्य से भी नाम का जय एवं फीर्तन करने से दसों दिशाओं में मंगल ही होता है तथा कलियुग में केवल भगवान् का गुणगान करने से ही संसार की थाह मिल जाती हैं। यद्यपि बाहर से लोगों को यह कीर्तन एक प्रकार का कौशल एवं गान कक्षा मात्र ही प्रतीत होता है तथापि इसमें बड़ा ही गम्भीर एवं वैज्ञानिक रहस्य है जो निवेदन किया जाता है।

जहाँ तक कीर्तन को ध्वनि गुजारित होती है, वहां तक के वायुमण्डल में भगग्नाम की ध्वनि, शब्द और भाव लय होकर व्याप्त हो जाते हैं। संकीर्तन के जितने गुण हैं, वे गुण वायु- मण्डल की सूक्ष्म धाराओं में एक रस होकर व्याप्त हो जाते हैं और वह स्थान तथा उतना वायुमण्डल उसी भावना से शुद्ध एवं श्रोत प्रोत हो जाता है। यह विज्ञान सिद्ध है तथा हम लोग प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं कि शब्द, ध्वनि, भाव तथा किया ये सब नष्ट नहीं हो जाते यद्यपि हमें यह प्रतीत होता है कि शब्द का उच्चारण मुख से हुआ तथा हमने सुना और वह तत्काल हो वायु में विलीन हो गया, अतः नष्ट हो गया; तथापि वह नष्ट नहीं होता अपितु यह वायुमण्डल में व्याप्त हो जाता है तथा उसको विज्ञान के द्वारा पृथक अनुभूतिपूर्वक जब चाहे तब बाद में भी अब किया जा सकता है। 

कीर्तन की ध्वनि में भी राजस तथा तामस भाव होता है। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्णा कृष्ण कृष्ण हरे हरे तथा श्री राम जय राम जय जय राम अथवा श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव इत्यादि कीर्तन शास्त्र से प्रथित हैं और इनसे जो कम्पन तथा भाव उत्पन्न होता है वह सात्विक तथा भगवद् भक्ति को उत्पन्न करने वाला होता है बाजे के साथ कीर्तन करने में कुछ राजस भावना या जाती है तथा आजकल जो सिनेमा आदि की ध्वनि तथा तर्ज पर कीर्तन बनाये जाते हैं और किये जाते हैं उनमें धीर राजस भाव रहता है, शुद्ध सात्विक भाव की उत्पत्ति नहीं होती। अतः शुद्ध सात्विक भावोत्पादक कीर्तन ही करना चाहिये जिससे भगवद्भक्ति उत्पन्न हो और परमात्मा में मन लगे न कि सिनेमा की ध्वनि में रस लेने लगे ।

तथा
अश्रद्धया दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । 
असदित्युण्यते पार्थं न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ 
(गीता १७।२८) 

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । 
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ।। 
(गीता १६।२३) 

अर्थात् जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्याग कर अपनी
इच्छा से वर्तता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है और न परम गति को तथा न सुख को ही प्राप्त होता है।

परन्तु कलिदोषसमूहसित आधुनिक लोगों में इस प्रकार की श्रद्धा, भावना तथा विधि का अभाव होने के कारण प्रत्यक्ष फल शीघ्र दृष्टिगोचर नहीं होता। यदि इस पर यह कहा जाय कि त तो कीर्तन करना व्यर्थ हैं तो यह ठीक नहीं है। 
गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने कहा है-

भाव कुभाव अनख आलसहूं । 
नाम जपत मंगल दिसि दसहूं । 
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । 
गावत नर पावहिं भवं थाहा ॥

अर्थात् भाव, कुभाव अनत्र एवं आलस्य से भी नाम का जय एवं फीर्तन करने से दसों दिशाओं में मंगल ही होता है तथा कलियुग में केवल भगवान् का गुणगान करने से ही संसार की थाह मिल जाती हैं। यद्यपि बाहर से लोगों को यह कीर्तन एक प्रकार का कौशल एवं गान कक्षा मात्र ही प्रतीत होता है तथापि इसमें बड़ा ही गम्भीर एवं वैज्ञानिक रहस्य है जो निवेदन किया जाता है।

जहाँ तक कीर्तन को ध्वनि गुजारित होती है, वहां तक के वायुमण्डल में भगग्नाम की ध्वनि, शब्द और भाव लय होकर व्याप्त हो जाते हैं। संकीर्तन के जितने गुण हैं, वे गुण वायु- मण्डल की सूक्ष्म धाराओं में एक रस होकर व्याप्त हो जाते हैं और वह स्थान तथा उतना वायुमण्डल उसी भावना से शुद्ध एवं श्रोत प्रोत हो जाता है। यह विज्ञान सिद्ध है तथा हम लोग प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं कि शब्द, ध्वनि, भाव तथा किया ये सब नष्ट नहीं हो जाते यद्यपि हमें यह प्रतीत होता है कि शब्द का उच्चारण मुख से हुआ तथा हमने सुना और वह तत्काल हो वायु में विलीन हो गया, अतः नष्ट हो गया; तथापि वह नष्ट नहीं होता अपितु यह वायुमण्डल में व्याप्त हो जाता है तथा उसको विज्ञान के द्वारा पृथक अनुभूतिपूर्वक जब चाहे तब बाद में भी अब किया जा सकता है। 

कीर्तन की ध्वनि में भी राजस तथा तामस भाव होता है। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्णा कृष्ण कृष्ण हरे हरे तथा श्री राम जय राम जय जय राम अथवा श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव इत्यादि कीर्तन शास्त्र से प्रथित हैं और इनसे जो कम्पन तथा भाव उत्पन्न होता है वह सात्विक तथा भगवद् भक्ति को उत्पन्न करने वाला होता है बाजे के साथ कीर्तन करने में कुछ राजस भावना या जाती है तथा आजकल जो सिनेमा आदि की ध्वनि तथा तर्ज पर कीर्तन बनाये जाते हैं और किये जाते हैं उनमें धीर राजस भाव रहता है, शुद्ध सात्विक भाव की उत्पत्ति नहीं होती। अतः शुद्ध सात्विक भावोत्पादक कीर्तन ही करना चाहिये जिससे भगवद्भक्ति उत्पन्न हो और परमात्मा में मन लगे न कि सिनेमा की ध्वनि में रस लेने लगे ।

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