श्रीमद्भागवत तृत्तीय श्रॅखला, तृत्तीय स्कन्ध, अध्याय २८|२९

प्रत्येक कल्प और अनुकल्प में यह संपूर्ण मायावी संसार किससे प्रकट होता है, किसमें निवास करता है और अंत समय में किसमें पुनः लीन हो जाता है, इस दृश्य जगत से सर्वथा भिन्न है, जिसका ध्यान करके ऋषियों को शाश्वत मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शाश्वत, शुद्ध, गतिहीन और सर्वव्यापी भगवान हैं, मैं पुरुषोत्तम (जगन्नाथजी) को नमस्कार करता हूं।जो शुद्ध है, आकाश के समान निष्कलंक है, नित्य आनंदमय है, नित्य सुखी है, पवित्र है, सबका स्वामी है, निर्गुण है, व्यक्त और अव्यक्त से परे है,

सांसारिकता से मुक्त है, प्रत्यक्ष है और ध्यान में सर्वव्यापी है, इस रूप में विद्वान पुरुष ध्यान करते हैं समाधि के समय पर संसार है जो सृष्टि की उत्पत्ति और विनाश के एकमात्र कारण हैं, जिन्हें बुढ़ापा भी छू नहीं सकता और जो मोक्ष प्रदान करने वाले हैं, उन भगवान श्रीहरि की पूजा करो।

श्रीमद्भागवत तृत्तीय श्रॅखला, तृत्तीय स्कन्ध, अध्याय २८|२९ 



Comments

Popular posts from this blog

धर्म के दश लक्षण (मनु के अनुसार)

शास्त्र

ब्राह्मण के नौ गुण क्या होते हैं