गणेश गीता
••|| गणेश गीता ||••
गणेश गीता गणेश पुराण के क्रिया खंड के अंतर्गत कुल ग्यारह अध्यायों में विस्तृत है।
यह सर्वप्रथम भगवान गणेश द्वारा राजा वरेण्य को दी गई ब्रह्म विद्या की शिक्षाओं का वर्णन करता है, जिसे व्यासजी ने आदि सिद्ध योग कहा है।
इसे सुनकर राजा को मुक्ति की प्राप्त हुई। इस परम ज्ञान को व्यास जी ने सूत जी को सुनाया, फिर क्रमशः ऋषि शौनक और शुकदेव जी को प्राप्त हुआ। इसमें उपदेशों के जो विषय है वो लगभग भगवद गीता के समान ही हैं। यहां कर्म योग, सांख्य योग,भक्ति योग, योग साधना, प्राणायाम, मानस पूजा, सगुनोपासना, विभुयोग, दर्शन जैसे अन्य महत्वपूर्ण विषयों का भी ऊल्लेख है।गणपति महाराज के विश्वव्यापी स्वरूप, त्रिविध प्रकृति और उसके अनुसार जीव की गति के बारे में बताया गया है, जो साधन और तत्वज्ञान की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी है।
इस गीता के अंत में इसके पाठ और ध्यान के महत्व का भी वर्णन किया गया है। इसकी कई टीकाएँ संस्कृत और मराठी में पाई जा सकती हैं।
श्रेय:गीता संग्रह की पुस्तक
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