विनय पत्रिका
हिम तम-करि-केहरि करमाली। दहन दोष दुख दुरित रूजाली।
कोक कोकनद लोक प्रकासी। तेज प्रताप रूप् रस-रासी।
दीन दयालु दिवाकर देवा। कर मुनि, मनुज, सुरासुर सेवा।।
हिम तम-करि-केहरि करमाली। दहन दोष दुख दुरित रूजाली।
कोक कोकनद लोक प्रकासी। तेज प्रताप रूप् रस-रासी।
सारथि-पंगु, दिब्य रथ गामी। हरि संकर बिधि मूरति स्वामी।
बेद पुरान प्रगट जस जागै। तुलसी राम-भगति बर मांगै।
हे दीनदयालु भगवान् सूर्य! मुनि, मनुष्य, देवता व राक्षस सभी आपकी सेवा करते हैं॥ आप पाले और अन्धकाररूपी हाथियों को मारने वाले वनराज सिंह है, किरणों की माला पहने रहते हैं, दोष, दुःख, दुराचार और रोगों को भस्म कर डालते है॥ रात के बिछुड़े चकवा-चकवियों को मिलवाकर प्रसन्न करने वाले।
कमल को खिलाने वाले, समस्त लोको को प्रकाशित करते है। तेज, प्रताप, रूप और रसकी आप खान है॥
आप दिव्य रथपर चलते है, आपके सारथी अरुण पंगु है। हे स्वामी आप विष्णु, शिव, ब्रह्मा के ही रूप हैं॥
वेद-पुराणो मे आपकी कीर्ति जगमगा रही है। तुलसीदास आपसे श्रीरामभक्ति का वर माँगता है।विनय पत्रिका
Comments
Post a Comment