उन समस्त कारणो के परे (सर्वकारणो के कारण) राम कहलाने वाले भगवान श्रीहरि की मै वंदना करता हूँ।
यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा
यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्।।
जिनकी माया के वश मे संपूर्ण विश्व,देवता, असुर है। जिनकी सत्ता से रस्सी मे सर्प के भ्रम जैसे सारा दृश्य जगत् सत्य प्रतीत होता है व जिनके केवल चरण ही भवसागर से तरने के लिए एकमात्र नौका है, उन समस्त कारणो के परे (सर्वकारणो के कारण) राम कहलाने वाले भगवान श्रीहरि की मै वंदना करता हूँ।
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥
जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥
शिव दो घड़ी तक ध्यान रस में डूब गए फिर मन बाहर खींचा, प्रसन्न होकर रघुनाथजी का चरित्र वर्णन करने लगे॥ जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता है और जान लेने से जगत् का उसी तरह लोप हो जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न भ्रम जाता रहताहै।
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥
मेरे दर्शन का परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
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