रघु वीर का यस
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किष्किंधा कांड के समापन में एक दोहा है- 'भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिंजे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।। ' श्री रघुवीर का यश भवरूपी रोग (जन्म-मरण) की अचूक दवा है। जो पुरुष-स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथ सिद्ध करेंगे।
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