राम कृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लह बिश्राम॥

बिनहीं रितु तरुबर फरत सिला द्रवति जल जोर।
राम लखन सिय करि कृपा जब चितवत जेहि ओर॥

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी जब कृपा करके जिसकी तरफ ताक लेते हैं तब बिना ही ऋतुके वृक्ष फलने लगते हैं और पत्थरकी शिलाओंसे बड़े जोरसे जल बहने लगता है ॥

बिनु बिस्वास भगति नहिं, तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। 
राम कृपा बिनु सपनेहुँ, जीव न लह बिश्राम॥

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