वेदान्त क्या है?
वेदान्त क्या है?
उत्तर:- वेदान्त यानी "वेद + अन्त" ; 'अन्त' अर्थात् 'अन्तिम निश्चय'। 'वेदान्त' अर्थात् 'वेद का अन्तिम निश्चय', यानी वेद के सारभूत परमज्ञान को वेदान्त कहते हैं। वेदान्त पर आचार्य सदानन्द जी वेदान्तसार ग्रन्थ में कहते हैं की "वेदान्त: नाम उपनिषत् प्रमाणं" अर्थात् 'उपनिषद्-रूप प्रमा के साधन को वेदान्त कहते हैं'। 'प्रमा' अर्थात् यथार्थ ज्ञान, जो उपनिषदों से होता है। यानी उपनिषद् वेदान्त के मूलस्रोत हैं। पर इसका यह अर्थ भी नहीं की उपनिषद् का हरेक वाक्य वेदान्त ही है, यहाँ जिस यथार्थ ज्ञान के बारे में कहा जा रहा है, हमें उसे भी समझना होगा। यजुर्वेदीय कठोपनिषद् – 2/3/14-15 :-
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥१४॥
यथा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् ॥१५॥
अनुवाद:- जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ, जो की इसके हृदय में आश्रय करके रहती हैं, छूट जाती हैं, उस समय वह 'मर्त्य' (अर्थात् मरणधर्मा) अमर हो जाता है और 'इस शरीर से ही' (अर्थात् इसी जीवन में) ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है ।14।
जिस समय इस जीवन में ही इसके 'हृदय की सम्पूर्ण ग्रन्थियों का' (अर्थात् अविद्याजनित सम्पूर्ण वासनाओं का) छेदन हो जाता है, उस समय यह मरणधर्मा अमर हो जाता है। 'बस इतना ही आदेश है' (अर्थात् सम्पूर्ण वेदान्तवाक्यों का बस इतना ही आदेश है) ।15।
👆 ब्रह्मभाव को प्राप्त होने पर हृदय की सभी अविद्याजनित वासनाएं नष्ट हो जाती हैं और मरणधर्मा अमर हो जाता है। बस इतना ही आदेश है सम्पूर्ण वेदान्तों का यानी सभी वेदान्त वाक्यों का, यही कठोपनिषद् के 2/3/15 के शाङ्करभाष्य में भी है। यानी वेदान्त-वाक्य वे ही हैं जो 'ब्रह्म और आत्मा के एकत्व के लिए' अर्थात् 'ब्रह्मात्मैक्य' के लिए ज्ञान प्रदान करें। अथर्ववेदीय मुण्डकोपनिषद् – 3/2/6 :-
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः
संन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्त्वाः।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले
परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥६॥
अनुवाद:- जिन्होंने वेदान्तजनित 'विज्ञान' (अर्थात् बोध) से 'ज्ञेय अर्थ' (अर्थात् परमात्मा) का अच्छी तरह से निश्चय कर लिया है, वे संन्यासयोग से यत्न करनेवाले समस्त शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोक में देहत्याग करते समय परम अमरभाव को प्राप्त हो के सब सब ओर से मुक्त हो जाते हैं ।6।
👆 अर्थात् वेदान्तजनित बोध से ही कोई ब्रह्म को अच्छी प्रकार से जान पाता है। अर्थात् वेदान्त केवल उसे ही कहते हैं जो ब्रह्मात्मैक्य के लिए ज्ञान प्रदान करता हो।
तो उपनिषदों के वे वाक्य जो ब्रह्मात्मैक्य के बोध के लिए ज्ञान प्रदान करते हों, केवल वही उपनिषद्-वाक्य वेदान्त कहलाते हैं। उपनिषद् के हरेक वाक्य को वेदान्त नहीं कह सकते क्योंकि उपनिषदों में ब्रह्मात्मैक्य के बोध कराने के सिवाय भी अन्य प्रकार का ज्ञान भी है। पर उपनिषदों का मुख्य उद्देश्य ब्रह्मात्मैक्य का बोध कराना ही है और उपनिषदों का अधिकांश भाग उसी के लिए समर्पित है, इसीलिए यह भी कहा जाता है की उपनिषद् ही वेदान्त है पर वास्तव में तो उपनिषदों के वे वाक्य ही वेदान्त हैं जो ब्रह्मात्मैक्य का बोध कराने के लिए हैं। ब्रह्मात्मैक्य का बोध कराना ही 'वेदान्त' अर्थात् वेदों का सारभूत परमज्ञान है।
शिवोऽहम् 🕉🙏
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