अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर जगत् मेरे स्वामी भगवान् का रूप है॥
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ॥
हे कपि! सुनो, मन में ग्लानि मत मानना।तुम मुझे लक्ष्मण से भी दूने प्रिय हो।सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं पर मुझको सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति होता है॥
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥3॥
और हे हनुमान्! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर जगत् मेरे स्वामी भगवान् का रूप है॥
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