साधना मे बाधा... सांसारिक सुख
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। |
- भावार्थ
जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी। हे राम जी! आप निरंतर मुझे प्रिय लगिए॥130 (ख)॥
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। |
जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी। हे राम जी! आप निरंतर मुझे प्रिय लगिए॥130 (ख)॥
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