हे उमा! राम बड़े ही कोमल हृदय और करुणा की खान हैं।

खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी॥
उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥

ब्राह्मणों का मांस खानेवाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह परम गति पाते हैं, जिसकी योगी भी याचना किया करते हैं 
हे उमा! राम बड़े ही कोमल हृदय और करुणा की खान हैं। राक्षस मुझे वैरभाव से ही सही, स्मरण तो करते ही हैं।


केवट निसिचर बिहग मृग किए साधु सनमानि।
तुलसी रघुबर की कृपा सकल सुमंगल खानि॥

तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी कृपा सब सुमंगलोंकी खान है, उस रामकृपाने केवट, राक्षस (विभीषण), पक्षी (जटायु) व बंदर भालुओं आदि को भी सम्मान देकर साधु बना दिया॥


न जानन् जानकीजानौ रामे तत्त्वम् अपि प्रभौ । धिक् कुर्याद् यमदूतान् स यो नरस्तत्त्व मीहते ॥

Sadashiva says:-Not knowing bhagwan Sita Ram but still someone who strives for the Absolute Truth are condemned by the messengers of Yamaraja and yamaraja himself.

~Brahma Ramayan

सदाशिव कहते हैं: -भगवान सीता राम को न जानने के बावजूद भी जो परम सत्य के लिए प्रयास करता है, उसकी यमराज के दूतों और स्वयं यमराज द्वारा निंदा की जाती है।

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