मनुस्मृति के अध्याय 6 के श्लोक 92 में धर्म के दस लक्षण दिए गए हैं। यह लक्षण द्विजो के लिए निर्धारित किये गये थे , क्युकी आश्रम व्यवस्था सिर्फ द्विजो के लिए ही निर्धारित किया गया था और यह प्रकरण आश्रम धर्म से संबंधित है। यह विवरण इस प्रकार हैं - चतुर्मिरपि चैवैतैर्नित्यमाश्रमिमिर्द्विजैः । दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ ९१ ॥ इन चारों आश्रम वाले द्विजातियोंको ( नीचे लिखा हुआ ) दस प्रकारका धर्म सदा यत्नपूर्वक करना चाहिये ॥ ९१ ॥ धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ ९२ ॥ संतोष , क्षमा , मनको वशमें रखना , न्यायसे धन लेना , पवित्रता , इन्द्रियोंको वशमें करना , धुद्धि , विद्या , सत्य और अक्रोध ये धर्मके दश लक्षण है ॥ ९२ ॥ दश लक्षणानि धर्मस्य ये विप्राः समधीयते । अधीत्य चानुवर्तन्ते ते यान्ति परमां गतिम् ॥ ९३ ॥ धर्मके इन दश लक्षणों को जो ब्राह्मण पढ़ते हैं और पढ़कर करते हैं वे परम गतिको पाते हैं ॥ ९३ ॥ दशलक्षणकं धर्ममनुतिष्ठन्समाहितः । वेदान्तं विधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः ॥ ९४ ॥ इन दस प्रकारके धर्मों को सावधान मनसे करके और विधिपूर...
प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा । पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते ||' (श्लोकवार्तिक, शब्दपरिच्छेद, श्लोक 4) ‘जिससे मनुष्य को नित्यकर्म में प्रवृत्ति और कृतककर्म से निवृत्ति का उपदेश किया जाय उसको ‘शास्त्र' कहते हैं ।’ जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः । जीविताशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति ॥ 'बूढ़े होनेवाले मनुष्य के बाल पक जाते हैं, उसके दाँत भी टूटने लगते हैं, परंतु धन और जीवनकी आशा उस मनुष्यके जीर्ण होनेपर भी जीर्ण ( शिथिल ) नहीं होती। यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् || 'संसारमें जो कामजनित सुख है तथा जो दिव्य महान् सुख हैं, वे सब मिलकर तृष्णा-क्षयसे होनेवाले सुखके सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते'। 'खोटी बुद्धिवाले पुरुषोंद्वारा जिसका त्याग होना कठिन है, जो मनुष्यके बूढ़े होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राण-नाशक रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग करनेवालेको ही सुख मिलता है। न छन्दांसि वृजिनं तारयन्ति मायाविनं मायया वर्तमानम् । छन्दांस्येनं प्रजहत्यन्तकाले नीडं शक...
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥ 27॥ भावार्थ- राम नाम नृसिंह भगवान है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करनेवाले जन प्रह्लाद के समान हैं, यह राम नाम देवताओं के शत्रु को मारकर जप करने वालों की रक्षा करेगा॥ 27॥ नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥ ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥ भावार्थ- ब्रह्मा के बनाए हुए इस प्रपंच (दृश्य जगत) से भली-भाँति छूटे हुए वैराग्यवान मुक्त योगी पुरुष इस नाम को ही जीभ से जपते हुए जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं। जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥ साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥ भावार्थ- जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को (यथार्थ महिमा को) जानना चाहते हैं, वे (जिज्ञासु) भी नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं। (लौकिक सिद्धियों के चाहनेवाले अर्थार्थी) साधक लौ लगाकर नाम का जप करते हैं और अणिमादि (आठों) सिद्धियों को पाकर सिद्ध हो जाते हैं। चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥ चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम...
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