Posts

https://youtu.be/E_5gF7AjpCY?si=Xv51IUqTz5VvrYht

Image
Skip to content Home Blog About us Contact privacy policy T&C X Youtube कामना का अर्थ क्या है — Meaning of Desire 6 Comments   /  Most Read  / By  Chandradeep Maharaj कामना एक मनोवृति है ! जब कोई किसी चीज को पाने की इच्छा करता है, तो इसे कामना समझा जाता है।  मन की इच्छा का प्रबल रुप कामना है। यह हर किसी के मन में किसी ना किसी रूप में मौजूद होता है। अपने शुद्ध स्वरुप में कामना उन्नतिशील और ज्ञान के अभाव में पतनशील हो जाता है। संत  कबीरदास  कहते हैं ‘ झुठे सुख को सुख कहै, मानत है मन मोद’ !  अर्थात् मनुष्य भौतिक संसाधनों, धन-दौलत से प्राप्त होने वाले क्षणिक सुख को ही सुख समझ लेता है। इसी क्षणिक सुख को भोगने में अपना सारा जीवन लगा देता है। उसके भोग में अंधा होकर मन ही मन प्रसन्न होते रहता है।  मन की इच्छाएं अनंत हैं, और मनुष्य की इंद्रियां इसके इच्छानुसार ही संचालित होती हैं। वह इन्द्रियों के द्वारा अपनी कामनाओं को पूर्ण करना चाहता है। परन्तु इन्द्रियों से प्राप्त सुख क्षणिक ही होता है। और ज्ञान के अभाव में क्षणिक सुखों को प्राप्त करना ही वह ...

राम ही सत्य

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥ धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता॥ जिसका मन श्रीराम के चरणों में अनुरक्त है, वही सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है। वही पृथ्वी का भूषण, पण्डित और दानी है। वही धर्मपरायण है और वही कुल का रक्षक है॥

स्मरण के फल

पुरुषारथ स्वारथ सकल परमारथ परिनाम। सुलभ सिद्धि सब सगुन सुभ सुमिरत सीताराम॥ श्रीसीता-रामजी के स्मरण से स्वार्थ के लिये किये गये मनुष्य के सभी प्रयत्न परमार्थ में परिणत हो जाते हैं तथा सभी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। तुलसी सहित सनेह नित सुमिरहु सीता राम। सगुन सुमंगल सुभ सदा आदि मध्य परिनाम॥ तुलसीदासजी कहते हैं कि नित्य-निरन्तर भगवान् श्रीसीतारामजीके सुन्दर सगुण स्वरूपका प्रेमसहित स्मरण-ध्यान करते रहो; इससे आदि, मध्य और अन्तमें सदा ही अच्छे शकुन, परम मंगल और कल्याण होगा॥

पाप नाशक महामंत्र

श्रीशब्दपूर्वं जयशब्दमध्यं जयद्वयेनापि पुनः प्रयुक्तम् । त्रिःसप्तकृत्वो रघुनाथनाम जपन्निहन्याद् द्विजकोटिहत्याः ॥ – श्रीमद्आनन्दरामायण अंतर्गत रामरक्षास्तोत्र से पहले श्री शब्द, बाद में राम नाम, फिर जय शब्द फिर राम नाम, फिर दो बार जय शब्द जोड़ कर राम नाम (अर्थात् श्रीराम जय राम जय जय राम) इक्कीस बार जप करने वाला प्राणी करोड़ों ब्रह्म हत्याओं जैसे महापातकों को भी नष्ट कर देता है।

Since navratra is also related to Shri Rama, replugging my Veer Raghav Ashtakam. 8 lines on Rama in the form of Vana Vasi.

Image
Since navratra is also related to Shri Rama, replugging my Veer Raghav Ashtakam. 8 lines on Rama in the form of Vana Vasi.

दुर्गा बत्तीसी

दुर्गा बत्तीसी अगर आपको ये छोटा सा स्तोत्र याद है तो आप किसी भी विपरीत परिस्थिति में इस स्तोत्र का बस मन ही मन पाठ करिये। दुर्गा दुर्गार्तिशमनी दुर्गापद्विनिवारिणी । दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ।। दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहन्त्री दुर्गमापहा । दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ।। दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्मस्वरूपिणी । दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ।। दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी । दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थस्वरूपिणी ॥ दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गमायुधधारिणी । दुर्गमाङ्गी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी ॥ दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी । नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया मम मानवः ॥ पठेत् सर्वभयान्मुक्तो भविष्यति न संशयः ॥ ऐसी जानकारियों के लिए मेरे हैंडल @pandeyji_dpk को follow करें और पोस्ट को RT/share करें दोस्तों🙏🏻

भगवती स्त्रोतराम

Image

सुगमाता से भगवत प्राप्ति

सत्य वचन, आधीनता, पर तिय मातु समान।  इतने पर हरि ना मिले, तो तुलसीदास जमान।।    जमानत दी तुलसीदास जी ने -  सत्य वचन - झूठ न बोलता हो।  आधीनता - गुरु, ग्रन्थ और गोविन्द का अनुशासन मानता हो, उनके अनुगत हो।  पर तिय मातु समान - पराई स्त्री में मातृ बुद्धि हो।  अगर ये तीन साधन जीवन में हैं, तो तुलसीदास जी कहते हैं - मैं जमानत देता हूँ, अर्थात् मिले बिना नहीं रह सकते।   तुलसीदास जी ने यह भी कहा है -   बिगरी जन्म अनेक की सुधरे अबही आजु । होहि राम कौ नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु।।    अनेकों जन्म से बात बिगड़ गई है लेकिन बिगड़ी हुई बात भी आज ही और अभी बन सकती है। बहुत सुगम साधन बताया - राम जी का होकर राम जी का नाम लो। होय राम कौ… राम जी के होकर, राम जी से सम्बन्ध स्थापित करें। माता, पिता, सखा… इस प्रकार से सम्बन्ध स्थापित करके, रामजी का होकर, राम जी को अपना इष्ट समझ कर…. यानि भगवान् के आश्रित होकर भगवान् का नाम लें।

। श्री राजराजेश्वरी अष्टकम्

http://reveredhinduism.blogspot.com/2017/08/shri-rajarajeshwari-ashtakam.https http://reveredhinduism.blogspot.com/2017/08/shri-rajarajeshwari-ashtakam.https   ।। श्री राजराजेश्वरी अष्टकम् ।। अम्बा शाँभवि चन्द्रमौलि रमलाऽपर्णा उमा पार्वती ।                              काली हैमवती शिवा त्रिनयनी   कात्यायनी भैरवी । सावित्री नवयौवना शुभकरी   साम्राज्य लक्ष्मीप्रदा ।                              चिद्रूपी      परदेवता    भगवती   श्री   राजराजेश्वरी ।। १ ।। अम्बा मोहिनी देवता त्रिभुवनी आनन्द सन्दायिनी ।                              वाणी पल्लव पाणि वेणु मुरली गानप्रिया लोलिनी । कल्याणी   उडुराजबिंब   वदना  धूम्राक्ष संहारिणी ।              ...

motivation movie

https://youtu.be/Rv8LC1FdrWw?si=l8m32hHqbYwap2ti

मंगल-द्वादश भाव में

Image
मंगल-द्वादश भाव में   कुण्डली में बारहवें भाव में बैठा मंगल क्या अशुभ प्रभाव डालता है।   1. शत्रुओं से हानि की आशंका। 2. लाभ से अधिक व्यय होगा। 3. घर में चोरी होने का भय। 4. पत्नी से अनबन। 5. जातक संतानहीन हो सकता है। उपाय एवं टोटके:-    1. चांदी की चेन धारण करें। 2. लाल रूमाल सदैव अपने पास रखें। 3. एक किलो पतासे मंगल के दिन बहते जल में प्रवाहित करें। 4. 'सिद्ध मंगल यंत्र' धारण करने से शुभ लाभ होगा। 5. तंदूर में मीठी रोटी सेंककर कुत्ते को खिलाएं। 6. साढ़े पांच रत्ती मूंगा सोने की अंगूठी में जड़वाकर धारण करें। Skip to content Mars in 12th House |  क्या, कुंडली के बारहवें भाव में मंगल ग्रह की उपस्थिति होगी अशुभ Acharya Vandana Posted on   जुलाई 25, 2023   Acharya Vandana , Grah     No Comments   Post Views:   655 वैदिक ज्योतिष के अनुसार,  कुंडली के बारहवें भाव में मंगल ग्रह  जातक के वैवाहिक जीवन और करियर के क्षेत्र में बहुत गुस्सा, निराशा और देरी लाता है। जन्म कुंडली में बारहवें भाव में मंगल ग्रह जातक को काफी आलसी और फिजूलखर...

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में वास्तुदोष

Image
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में वास्तुदोष तथा वास्तु संबंधी नियमों का विशेष महत्व होता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में यदि वास्तु संबंधी कोई भी दोष होता है तो इसका नकारात्मक प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर जरूर पड़ता है, उस घर में सुख और शांति का हमेशा अभाव बना रहता है। 

योग दिवस

Image
निन्दाप्रशंसे चात्यर्थं न वदन्ति परस्य ये। न च निन्दाप्रशंसाभ्या विक्रियन्त कदाचन।। योगी अन्य लोगों की निन्दा-प्रशंसा के रूप में बातचीत नहीं करते हैं और न अन्य लोगों द्वारा की गई निन्दा-प्रशंसा से उनके मन कभी प्रभावित ही होते हैं। युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।। (श्रीमद्भगवद्गीता६.१७) उचित आहार विहार करने वाले के लिए,,उचित क्रियाकलाप करने वाले के लिए,,उचित जागरण एवं शयन करने वाले के लिए योग समस्त शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक दु:खों को नष्ट कर देता है योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥२॥ - योगसूत्रम् (पतञ्जलिः) Yoga is restraining the mind (Chitta) from taking various forms (Vrittis). There are 196 Yoga Sutras given by Patanjali, divided into four chapters: समाधि - 51 सूत्र साधन - 55 सूत्र विभूति - 56 सूत्र कैवल्य - 34 सूत्र

विष्णु जी के कल्याणकारी 28 नाम

विष्णु जी के कल्याणकारी 28 नाम अर्जुन उवाच किं नु नाम सहस्त्राणि जपते च पुनः पुनः ।  यानि नामानि दिव्यानि तानि चाचक्ष्व केशव ।। श्री भगवान उवाच मत्स्यम् कूर्म वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।  गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ।।   पद्मनाभं सहस्त्राक्षं वनामालिं हलायुधम् । गोवर्धनं हृषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ।।  विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् । दामोदरं श्रीधरं च वेदाङ्ग गरुडध्वजम् ।। अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम् ।  गवां कोटिप्रदानस्य अश्वमेधशतस्य च ।।  कन्यादानसहस्त्राणां फलं प्राप्नोति मानवः ।  अमायां वा पौर्णमास्यामेकादश्यां तथैव च ।। सन्ध्याकाले स्मरेन्नित्यं प्रातः काले तथैव च।  मध्याह्न च जपन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।।  ।।इति श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रीविष्णोरष्टाविंशतिनामस्तोत्रं सम्पूर्णम्।। श्री भगवान बोले- अर्जुन ! मत्स्य, कूर्म, वराह, वामन, जनार्दन, गोविन्द, पुण्रीकाक्ष, माधव, मधुसूदन, पद्मनाभ, सहस्त्राक्ष, वनमाली, हलायुध, गोवर्धन, हृषीकेश, वैकुण्ठ, पुरुषोत्तम, विश्वरूप, वासुदेव, राम, नारायण, हरि, दामोदर,...

त्रयोदशाक्षर मन्त्र विजयमन्त्र 'मन्त्रराज' कहा जाता है।

Image
श्रीरामेति पदं चोक्त्वा जय राम ततः परम् । जय द्वयं वदेत् प्राज्ञो रामेति मन्त्रराजकः ॥ अर्थात् 'श्रीराम' कहने के बाद 'जय राम' कहना चाहिये। तत्पश्चात् दो बार 'जय-जय' बोलकर 'राम' बोलना चाहिये। यही त्रयोदशाक्षर मन्त्र विजयमन्त्र 'मन्त्रराज' कहा जाता है।

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मये नमः

इसे सुनें ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥ ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मये नमः॥  महालक्ष्मी का यह मंत्र धन, समृद्धि और प्रचुरता के लिए एक बीज मंत्र है।   नकारात्मकता और गरीबी को दूर करता है । https://youtu.be/Q_cvHbqxbxk?si=42L6DS1flQV0U2Fv https://hindi.webdunia.com/navratri-special/navratri-chamunda-mantra-116100200025_1.html

रसोई ,रंग और सौचालय ये मुख्य वास्तु दोष है

opposit side वाले को नही use करना