Posts

Showing posts from June, 2021

स्कन्द पुराण

स्कंदपुराण में भी राम नाम की महिमा का गुणगान किया गया है – रामेति द्वयक्षरजप: सर्वपापापनोदक:। गच्छन्तिष्ठन् शयनो वा मनुजो रामकीर्तनात्।। इड निर्वर्तितो याति चान्ते हरिगणो भवेत्।                              – स्कंदपुराण अर्थात यह दो अक्षरों का मंत्र(राम) जपे जाने पर समस्त पापों का नाश हो जाता है। चलते, बैठते, सोते या किसी भी अवस्था में जो मनुष्य राम नाम का कीर्तन करता है, और अंत में भगवान विष्णु का पार्षद बनता है। That is, when this two-syllable mantra (Ram) is chanted, all sins are destroyed.  One who chants the name of Rama while walking, sitting, sleeping or in any state, and finally becomes a councilor of Lord Vishnu.

उपनिषदो का ज्ञान

सस्यमिव मर्त्य: पच्यते सस्यमिवाजायते पुन: ! #कठोपनिषद   आत्म-उन्नयन,आत्म-उत्कर्ष व पारमार्थिक प्रवृत्तियों से ही परिवार-समाज-राष्ट्र का उत्थान संभव है।अतः अखण्ड-प्रचण्ड पुरुषार्थ द्वारा अज्ञान निवृत्ति और आत्मजागरण की तत्परता हमारा प्रथम लक्ष्य होना चाहिए।  The upliftment of family-society-nation is possible only through self-upgradation, self-exaltation and transcendental tendencies. Therefore, our first goal should be the readiness of self-retirement and self-awareness through unbroken-powerful effort.

जनक-सुनयना संवाद (भरतजी की महिमा)

Image
जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा दोहा : * बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि॥287॥ भावार्थ:- राजा-रानी ने बार-बार मिलकर और हृदय से लगाकर तथा सम्मान करके सीताजी को विदा किया। चतुर रानी ने समय पाकर राजा से सुंदर वाणी में भरतजी की दशा का वर्णन किया॥287॥ चौपाई : * सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥ मूदे सजन नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन॥1॥ भावार्थ:- सोने में सुगंध और (समुद्र से निकली हुई) सुधा में चन्द्रमा के सार अमृत के समान भरतजी का व्यवहार सुनकर राजा ने (प्रेम विह्वल होकर) अपने (प्रेमाश्रुओं के) जल से भरे नेत्रों को मूँद लिया (वे भरतजी के प्रेम में मानो ध्यानस्थ हो गए)। वे शरीर से पुलकित हो गए और मन में आनंदित होकर भरतजी के सुंदर यश की सराहना करने लगे॥1॥ * सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि॥ धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू॥2॥ भावार्थ:- (वे बोले-) हे सुमुखि! हे सुनयनी! सावधान होकर सुनो। भरतजी की कथा संसार के बंधन से छुड़ाने वाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार- इन तीनों विषयों में अपनी बु...

विवेक चूणामणि

Image
    ब्रह्म (ईश्वर) के अस्तित्व और स्वरुप पर सर्वथा प्रश्न होते आये हैं। ब्रह्मसूत्र (उत्तर मीमांसा) के प्रथम सूत्र में भगवान वेदव्यास ने कहा   “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा”  अर्थात, ब्रह्म जानने की जिज्ञासा। मीमांसा का अर्थ है ‘जिज्ञासा’। ब्रह्म के स्वरुप के बारे में द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, केवलाद्वैत, द्वैताद्वैत आदि ऐसी कई विचारधाराएँ हैं।  ‘अहम् ब्रह्मास्मि’  या अद्वैत वेदांत इन्हीं में से एक है। जब पैर में कांटा चुभता है तब आँख से पानी आता है और हाथ कांटे को निकालने के लिए जाता है, यह अद्वैत का एक उत्तम उदाहरण है। हम अद्वैत वेदांत की प्रक्रिया से इस को समझने की कोशिश करेंगे। जीवों को प्रथम तो नर जन्म ही दुर्लभ है, उससे भी अधिक दुर्लभ पुरुषत्व और उससे भी अधिक ब्राह्मणत्व का मिलना कठिन है। ब्राह्मण होने के बाद भी वैदिक धर्म का अनुगामी होना और उसमें भी विद्वत्ता का होना कठिन माना गया है। इतना ही नहीं यह सब कुछ होने पर भी आत्मा और अनात्मा का विवेक, सम्यक अनुभव, ब्रह्मात्म भाव से स्थिति और मुक्ति – ये तो करोणों जन्मों में किये हुए शुभ कर्मों के परिपाक के बिना...

अवधूत गीता

Image
अवधूत गीता भगवान् दत्तात्रेय के अपूर्व वचनो का ग्रन्थ है। जिसमे जीव के वास्तविक मूल स्वरुप का उपदेश किया गया है। आज से हम 10 श्लोको का प्रतिदिन हिंदी अनुवाद देने जा रहे है। आशा है की सभी मुमुक्षु जन इससे लाभ उठावेंगे।। महान् भय से रक्षा करने वाली अद्वैत की वासना मनुष्यों में, विप्रों में ईश्वर के अनुग्रह (कृपा) से ही उत्पन्न होती है॥२॥ यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत जिस आत्मा द्वारा आत्मा से आत्मा में ही पूर्ण हो रहा है उस निराकार (ब्रह्म) का मैं किस प्रकार वन्दन करूँ क्योंकि वह (जीव से) अभिन्न है, कल्याण स्वरूप है, (तथा) अव्यय है॥३॥ यह विश्व पाँच भूतों का समुदाय हैं जो मृगतृष्णा के जल के समान मिथ्या भी है। मैं एक ही निरन्जन (निर्दोष) हूँ। फिर मैं किसको नमस्कार करूँ॥४॥ यह आत्मा ही सर्वरूप है तथा केवल है जिसमें भेद और अभेद विद्यमान नहीं है- इसे मैं ‘है’ अथवा ‘नहीं है’ किस प्रकार कहूँ। मुझे यह आश्चर्य रूप प्रतीत होता है॥५॥ वेदान्त का सार ही हमारा सर्वस्व है और वही ज्ञान एवं विज्ञान है। मैं आत्मा हूँ, निराकार हूँ तथा स्वभाव से ही सर्वव्यापी हूँ॥६॥ जो सर्वस्वरूप देव ( ब्रह्म) है वह अवयव रहित...

निर्वाणषट्कम

Image
जब आदि गुरु शन्कराचार्य जी की अपने गुरु से प्रथम भेंट हुई तो उनके गुरु ने बालक शंकर से उनका परिचय माँगा । बालक शंकर ने अपना परिचय किस रूप में दिया ये जानना ही एक सुखद अनुभूति बन जाता है…  यह परिचय ‘निर्वाण-षटकम्’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ । मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे | न च व्योम भूमि न तेजो न वायु: चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम ||1|| [मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ…] I am not mind, nor intellect, nor ego, nor the reflections of inner self (chitta). I am not the five senses. I am beyond that. I am not the ether, nor the earth, nor the fire, nor the wind (the five elements). I am indeed, That eternal knowing and bliss, the auspicious (Shivam), love and pure consciousness. न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः न वा सप्तधातु: न वा पञ्चकोशः | न वाक्पाणिपादौ न च उपस्थ पायु चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम ||2|| [न मैं मुख्य प्राण हूँ और...

भगवत गीता - संक्षेप मे

Image
भगवान कहते हैं- अंतःकरण का निग्रह,इंद्रियों को वश में करना,धर्मपालन के लिए कष्ट सहना,बाहरभीतर से शुद्ध रहना,दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, सरलता रखना,वेद का ज्ञान,ईश्वर में श्रद्धा,परमात्मा के तत्त्व का अनुभव-ये सबकेसब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। -गीता१८.४२ #जयश्रीकृष्ण  God says-  The conscience of conscience, subdue the senses, suffer suffering for piety, remain pure from outside, forgive the transgressions of others, keep it simple, knowledge of the Vedas, reverence in God, experience of the essence of God - all these are the Brahmin  Are natural deeds. भगवान तामस सुख का वर्णन करते हैं- जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होनेवाला सुख तामस कहा गया है। (तामस पुरुष को निद्रा,आलस्य और प्रमाद से सुख मिलता है )  -गीता१८.३९  #जयश्रीकृष्ण  Lord Tamas describes happiness -  The pleasure which enchants the soul in the time of enjoyment and also in the result, that pleasure ar...

विष्णुपुराण

Image
इसका उच्चारण करते हुए दिन अथवा रात्रिमें किसी समय भी अन्धकारमें जानेसे सर्प नहीं काटता तथा इसका स्मरण करके भोजन करनेवालेका खाया हुआ विष भी घातक नहीं होता। #विष्णुपुराण-३।४।१३ भगवान् विष्णुके चरणनखसे निकले हुए गंगा जलका माहात्म्य - वह कामनापूर्वक केवल स्नानादि कार्यों में ही उपयोगी हो-सो नहीं, अपितु, बिना कामनाके मृतक पुरुषके अस्थि, चर्म, स्नायु अथवा केश आदिका स्पर्श हो जानेसे या उसके शरीरका कोई अंग गिरनेसे भी वह देहधारीको तुरंत स्वर्गमें ले जाता है।" 'भोगोंकी #तृष्णा उनके भोगनेसे कभी शान्त नहीं होती, बल्कि घृताहुतिसे अग्निके समान वह बढ़ती ही जाती है। सम्पूर्ण पृथिवीमें जितने भी धान्य, यव, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं वे सब एक मनुष्यके लिये भी सन्तोषजनक नहीं हैं, इसलिये तृष्णाको सर्वथा त्याग देना चाहिये।जिस समय कोई पुरुष किसी भी प्राणीके लिये पापमयी भावना नहीं करता, उस समय उस समदर्शीके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी हो जाती हैं।दुर्मतियोंके लिये जो अत्यन्त दुस्त्यज है तथा #वृद्धावस्था में भी जो शिथिल नहीं होती, बुद्धिमान् पुरुष उस तृष्णाको त्यागकर सुखसे परिपूर्ण हो जाता है।...