शम्पाक गीता । महाभारत शांति पर्व के अंतर्गत
युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! धनी और निर्धन दोनों स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार करते हैं, फिर उन्हें किस रूप में और कैसे सुख और दुख की प्राप्ति होती है? भीष्म जी ने कहा- युधिष्ठिर ! इस विषय में विद्वान पुरुष इस पुरातन इतिहास देते हैं, जिसे परम शान्त जीवन्मुक्त शम्पाक ने यहाँ कहा था। पहले की बात है, फटे–पुराने वस्त्रों एवं अपनी दुष्टा स्त्री के और भूख के कारण अत्यन्त कष्ट पाने वाले एक त्यागी ब्राह्मण ने जिसका नाम शम्पाक था, मुझसे इस प्रकार कहा- ‘इस संसार में जो भी मनुष्य उत्पन्न होता है (वह धनी हो या निर्धन) उसे जन्म से ही नाना प्रकार के सुख–दुख प्राप्त होने लगते हैं। ‘विधाता यदि उसे सुख और दुख इन दोनों में से किसी एक के मार्ग पर ले जाय तो वह न तो सुख पाकर प्रसन्न हो और न दुख में पड़कर परितप्त हो। त्याग की महिमा का वर्णन शम्पाकगीता ये श्लोक टोकुनागा/ बोरी संस्करण के १७० अध्याय से और किंजवाडेकर संस्करण के १७६ अध्याय से हैं। अध्यायः १७६ [युधिष्ठिर उवाच] धनिनश्चाधना ये च वर्तयन्ते स्वतन्त्रिणः। सुखदुःखागमस्तेषां कः कथं वा पितामह॥१॥ [भीष्म उवाच] अत्र...