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Showing posts from September, 2021

शम्पाक गीता । महाभारत शांति पर्व के अंतर्गत

युधिष्ठिर  ने पूछा- पितामह! धनी और निर्धन दोनों स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार करते हैं, फिर उन्हें किस रूप में और कैसे सुख और दुख की प्राप्ति होती है?  भीष्‍म जी  ने कहा-  युधिष्ठिर ! इस विषय में विद्वान पुरुष इस पुरातन इतिहास देते हैं, जिसे परम शान्त जीवन्मुक्‍त शम्पाक ने यहाँ कहा था। पहले की बात है, फटे–पुराने वस्त्रों एवं अपनी दुष्‍टा स्त्री के और भूख के कारण अत्यन्त कष्‍ट पाने वाले एक त्यागी  ब्राह्मण  ने जिसका नाम शम्पाक था, मुझसे इस प्रकार कहा- ‘इस संसार में जो भी मनुष्‍य उत्पन्न होता है (वह धनी हो या निर्धन) उसे जन्म से ही नाना प्रकार के सुख–दुख प्राप्‍त होने लगते हैं। ‘विधाता यदि उसे सुख और दुख इन दोनों में से किसी एक के मार्ग पर ले जाय तो वह न तो सुख पाकर प्रसन्न हो और न दुख में पड़कर परितप्त हो। त्याग की महिमा का वर्णन शम्पाकगीता   ये श्लोक टोकुनागा/ बोरी संस्करण के १७० अध्याय से और किंजवाडेकर संस्करण के १७६ अध्याय से हैं। अध्यायः १७६ [युधिष्ठिर उवाच] धनिनश्चाधना ये च वर्तयन्ते स्वतन्त्रिणः। सुखदुःखागमस्तेषां कः कथं वा पितामह॥१॥ [भीष्म उवाच] अत्र...

क्या कोई महिला किसी को गुरु बना सकती है या गुरु बन सकती है?

शास्त्र में उल्लेख है- गुरुर्ग्निर्दिजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरु:। पतिरेव गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरु:॥-' (पद्मपुराण, स्वर्ग॰ 51/51 ब्रह्मपुराण 80/47)' अर्थात अग्नि द्विजातियों का गुरु है, ब्राह्मण चारों वर्णो का गुरु है, एक मात्र पति ही स्त्री का गुरु है, अतिथि सब का गुरु है।   वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः। पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया॥- (मनुस्मृति 2/67) अर्थात : स्त्रियों के लिए वैवाहिक विधि का पालन ही वैदिक संस्कार/यज्ञोपवित, पति सेवा ही गुरुकुल वास और गृहकार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है।' स्त्री को पति के सिवाय किसी भी पुरुष से किसी प्रकार का संबंध नहीं जोड़ना चाहिए।     कलिकाल में तो यह कहा जाने लगा कि माताओं से प्रार्थना है कि वे किसी भी साधु, तथाकथित गुरु के भ्रम जाल में न पड़ें क्योंकि आजकल बहुत ठगी, दम्भ, पाखण्ड हो रहा है। साधु को चाहिए कि वे किसी स्त्री को शिष्या न बनाएं। स्त्री ही स्त्री को दीक्षा दे या गुरु बनाएं तो उचित होगा।     विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशनास्तेऽपि स्त्रीमुखपड़्कजं सुललितं दृष्ट्...

मानस का रूप और माहात्म्य

मानस का रूप और माहात्म्य दोहा : * जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु। अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु॥35॥ भावार्थ:- यह रामचरित मानस जैसा है, जिस प्रकार बना है और जिस हेतु से जगत में इसका प्रचार हुआ, अब वही सब कथा मैं श्री उमा-महेश्वर का स्मरण करके कहता हूँ॥35॥ चौपाई : * संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी॥ करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥1॥ भावार्थ:- श्री शिवजी की कृपा से उसके हृदय में सुंदर बुद्धि का विकास हुआ, जिससे यह तुलसीदास श्री रामचरित मानस का कवि हुआ। अपनी बुद्धि के अनुसार तो वह इसे मनोहर ही बनाता है, किन्तु फिर भी हे सज्जनो! सुंदर चित्त से सुनकर इसे आप सुधार लीजिए॥1॥ * सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू॥ बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी॥2॥ भावार्थ:- सुंदर (सात्त्वकी) बुद्धि भूमि है, हृदय ही उसमें गहरा स्थान है, वेद-पुराण समुद्र हैं और साधु-संत मेघ हैं। वे (साधु रूपी मेघ) श्री रामजी के सुयश रूपी सुंदर, मधुर, मनोहर और मंगलकारी जल की वर्षा करते हैं॥2॥ * लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥...

मानस निर्माण की तिथि

मानस निर्माण की तिथि * सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥ संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥2॥ भावार्थ:- अब मैं आदरपूर्वक श्री शिवजी को सिर नवाकर श्री रामचन्द्रजी के गुणों की निर्मल कथा कहता हूँ। श्री हरि के चरणों पर सिर रखकर संवत्‌ 1631 में इस कथा का आरंभ करता हूँ॥2॥ * नौमी भौम बार मधुमासा। अवधपुरी यह चरित प्रकासा॥ जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल जहाँ चलि आवहिं॥3॥ भावार्थ:- चैत्र मास की नवमी तिथि मंगलवार को श्री अयोध्याजी में यह चरित्र प्रकाशित हुआ। जिस दिन श्री रामजी का जन्म होता है, वेद कहते हैं कि उस दिन सारे तीर्थ वहाँ (श्री अयोध्याजी में) चले आते हैं॥3॥ * असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा॥ जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना॥4॥ भावार्थ:- असुर-नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता सब अयोध्याजी में आकर श्री रघुनाथजी की सेवा करते हैं। बुद्धिमान लोग जन्म का महोत्सव मनाते हैं और श्री रामजी की सुंदर कीर्ति का गान करते हैं॥4॥ दोहा : * मज्जहिं सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर। जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर॥34॥ भावार्थ:- सज...

श्री रामगुण और श्री रामचरित्‌ की महिमा

श्री रामगुण और श्री रामचरित्‌ की महिमा * मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥ राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥2॥ भावार्थ:- वे (श्री रामजी) मेरी (बिगड़ी) सब तरह से सुधार लेंगे, जिनकी कृपा कृपा करने से नहीं अघाती। राम से उत्तम स्वामी और मुझ सरीखा बुरा सेवक! इतने पर भी उन दयानिधि ने अपनी ओर देखकर मेरा पालन किया है॥2॥ * लोकहुँ बेद सुसाहिब रीती। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती॥ गनी गरीब ग्राम नर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर॥3॥ भावार्थ:- लोक और वेद में भी अच्छे स्वामी की यही रीति प्रसिद्ध है कि वह विनय सुनते ही प्रेम को पहचान लेता है। अमीर-गरीब, गँवार-नगर निवासी, पण्डित-मूर्ख, बदनाम-यशस्वी॥3॥ * सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी॥ साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला॥4॥ भावार्थ:- सुकवि-कुकवि, सभी नर-नारी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार राजा की सराहना करते हैं और साधु, बुद्धिमान, सुशील, ईश्वर के अंश से उत्पन्न कृपालु राजा-॥4॥ * सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी॥ यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ॥5॥ भावार्थ:- सब...

श्री नाम वंदना

श्री नाम वंदना और नाम महिमा चौपाई : * बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥ बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥1॥ भावार्थ:- मैं श्री रघुनाथजी के नाम 'राम' की वंदना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात्‌ 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है। वह 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों का प्राण है, निर्गुण, उपमारहित और गुणों का भंडार है॥1॥ *महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥ महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥2॥ भावार्थ:- जो महामंत्र है, जिसे महेश्वर श्री शिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशी में मुक्ति का कारण है तथा जिसकी महिमा को गणेशजी जानते हैं, जो इस 'राम' नाम के प्रभाव से ही सबसे पहले पूजे जाते हैं॥2॥ * जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥ सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी॥3॥ भावार्थ:- आदिकवि श्री वाल्मीकिजी रामनाम के प्रताप को जानते हैं, जो उल्टा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गए। श्र...

आदिगुरू शन्कराचार्य का तत्व बोध

  अध्यात्म में जरा भी रूचि हो तो मोक्ष पद , परमात्म प्राप्ति, आत्म साक्षात्कार की जिज्ञासा होती है| ये जिज्ञासा इस अवस्था को हासिल करने से ज्यादा इसके बारे में जानने की होती है| हम जानना चाहते हैं मोक्ष, आत्मज्ञान, तत्वज्ञान, परम पद, परमात्म साक्षात्कार अलग अलग हैं या एक ही अवस्था के आलग नाम? ये अवस्था मरने के पहले मिलती है या मरने के बाद? इस अवस्था से क्या लाभ?  लाभ के बारे में जानना मनुष्य की सहज वृत्ति है|  भारतीय दर्शन ने इस बारे में हमें काफी कुछ बताया है| हालाकि ये "अनुभव और प्राप्ति" का विषय है लेकिन इसकी चर्चा का भी अपना महत्व है|  जैसे हिंसा की चर्चा से दिमाग में हिंसा से जुड़े विचार घर कर जाते हैं, वैसे ही अध्यात्म की चर्चा से माइंड उसी उसी के बारे में सोचता है|  मोक्ष, आत्मज्ञान, तत्वज्ञान, परम पद, परमात्म साक्षात्कार वस्तुतः एक ही अवस्था के अलग अलग नाम हैं| क्यूंकि इस अवस्था में दूसरा कुछ रहता ही नहीं सब एक हो जाता है, इसलिए इसे ही अद्वैत भाव कहते हैं| तत्व ज्ञान यूँ तो बुद्धि से समझा जा सकता है लेकिन वास्तविक ज्ञान तो अनुभव से ही होगा| फिर भ...

आत्मा क्या है ?

  आत्मा क्या है ? आत्मा(तत्त्वमसि) सत चित आनन्द स्वारूप है। सत -जो बदलता नही चित - प्रकाश, ज्ञान स्वारूप आनंद - बिना दुख के लगभग सभी धर्म सम्प्रदायों के अध्यात्मिक ग्रंथो तथा आप्त पुरुषों ने आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारा है । आदि शंकराचार्य के अनुसार वेदों में कहा गया है कि - 'प्रज्ञानं ब्रह्म ' अर्थात ज्ञान ही ब्रह्म है - ऋग्वेद , ऐतरेय उपनिषद ३ /१/३ 'तत्वमसि ' - अर्थात वह ब्रह्म तू ही है - सामवेद, छान्दोग्य उपनिषद ६ /८ / ७ 'ऐयात्मा ब्रह्म ' - अर्थात यह आत्मा ही ब्रह्म है, अथर्ववेद , मांडूक्य उपनिषद मन्त्र २ 'अहम् ब्रह्मसिम ' - अर्थात मैं ब्रह्म हूँ - यजुर्वेद बृहदारण्यक उपनिषद १ / ४ ० आत्मा को ही ब्रह्म कहा गया है तथा यह भी कि प्रतेयक  प्राणी के शारीर में व्याप्त आत्मा अजर , अमर , नित्य , अनादि अविनाशी तथा प्रकाश स्वरुप है । शारीर के मृत हो  जाने पर भी यह आत्मा नहीं मरती । आत्मा का अस्तित्व बना रहता है । आत्मा ( The soul ) का विचार सम्भवतः सबसे पहले आर्य ऋषियों के मन में ही आया । उन्होने  अनुभव किया कि जो कुछ भी हमारी दृष्टि में  आता है , हम देखते हैं...

EIGHT TYPES OF BRAHMINS AS PER SKANDA PURANAM

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EIGHT TYPES OF BRAHMINS AS PER SKANDA PURANAM 1) Matra (मात्र) Brahmin is the one who took birth as Brahmin but has no inclination towards Knowledge. 2) Brahmins follow the rules ascribed to him as a Brahmin and has positive qualities.  3)  Shrotriya brahman are considered to be those who possess knowledge of a particular Veda, and has positive qualities. 4) Anuchang are those Brahmins who impart vedic knowledge and have the qualities of Shrotriya as well, are pure with clear thinking. 5) Bhruun is that Brahmin who stays in an Ashram and knows the vedas well. 6) Rishikalp is that Brahmin who follows  rules and is a scholar of Vedas. 7) Rishi is that Brahmin who follow Brahmcharya and are pure, capable of bestowing boons and curses. 8) Muni is the one that who is totally detached having attained true Knowledge. Source - Skanda Puran (Gita press)

चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों के द्वारा सेवा

चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों के द्वारा सेवा दोहा : * चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ। आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ॥132॥ भावार्थ:- महामुनि वाल्मीकिजी ने चित्रकूट की अपरिमित महिमा बखान कर कही। तब सीताजी सहित दोनों भाइयों ने आकर श्रेष्ठ नदी मंदाकिनी में स्नान किया॥132॥ चौपाई : * रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥ लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा॥1॥ भावार्थ:- श्री रामचन्द्रजी ने कहा- लक्ष्मण! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहीं कहीं ठहरने की व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजी ने पयस्विनी नदी के उत्तर के ऊँचे किनारे को देखा (और कहा कि-) इसके चारों ओर धनुष के जैसा एक नाला फिरा हुआ है॥।1॥ * नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना॥ चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी॥2॥ भावार्थ:- नदी (मंदाकिनी) उस धनुष की प्रत्यंचा (डोरी) है और शम, दम, दान बाण हैं। कलियुग के समस्त पाप उसके अनेक हिंसक पशु (रूप निशाने) हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं और जो सामने से मारता है॥2॥ * अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा॥ रमेउ र...