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Showing posts from May, 2024

"रामनाम्न: परो मंत्रो न भूतो न भविष्यति।" 'राम' इस शब्द में रकार रसातल लोक से, अकार भूमंडल से एवं मकार मह:लोक से आया है, इसी कारण यह त्रिवर्णात्मक राममन्त्र है। श्रीरामचंद्र जी रकार के द्वारा भवसिंधु से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। अकार से भक्तों को

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"रामनाम्न: परो मंत्रो न भूतो न भविष्यति।"  'राम' इस शब्द में रकार रसातल लोक से, अकार भूमंडल से एवं मकार मह:लोक से आया है, इसी कारण यह त्रिवर्णात्मक राममन्त्र है। श्रीरामचंद्र जी रकार के द्वारा भवसिंधु से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। अकार से भक्तों को अतिशय सौख्य (सुख) प्रदान करते हैं। मकार से भक्तों की कामना पूर्ण करते हैं और बाधाएं दूर करते हैं। एकमात्र यह राम नाम ही तारक है, यह मनुष्यों को संसार रूपी समुद्र से तार सकता है। इसीलिए मरते समय कान में राम नाम का उपदेश तथा मृत्यु के बाद राम नाम का कीर्तन किया जाता है। स्वयं शिवजी, हनुमानजी, नारदजी और पार्वतीजी इस राम नाम का जप करते हैं।🙏-आनन्द रामायण

अष्टादशशक्तिपीठ

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अष्टादशशक्तिपीठ स्तोत्र में 18 शक्तिपीठों का वर्णन है जिसमे कोल्हापुर अम्बामाई के इस स्थान का वर्णन भी आता है। इस स्तोत्र का पाठ करने मात्र से व्यक्ति का शत्रु भय समाप्त होता है, सभी सुख, आरोग्य प्राप्त करता है, इस स्तोत्र का पाठ करने वाला व्यक्ति  ऐश्वर्य, यश और सभी संपत्तियों का स्वामी जोटा है।

सीता - स्तुति

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Colors of Mithila अपन भव्य सांस्कृतिक-सामाजिक परम्परा, लोककला, धरोहर​ आ मिथिला मैथिल विकास प्रतिष्ठाक लेल स्वयंके समर्पित केनिहार युवा कार्यकर्ता, लेखक, कवि, कलाकार, सामाजिक मंडली केर जानकारी आ एहिसं जुड़ल बेवसाइट/ ब्लागक लिंक के एक मंच पर आनि मिथिलाक भव्यता​सं अपन भइयारी आ नवतुरिआक संग विश्व के स्मरण करेबाक एकटा प्रयास सीता - स्तुति Mata Janki निज इच्छा मखभूमि ते प्रगटभईं सिय आय। चरित किये पावन परम बरधनमोद निकाय। भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जन हितकारी भयहारी। अतुलित छबि भारी मुनि-मनहारी जनकदुलारी सुकुमारी।। सुन्दर सिंहासन तेहिं पर आसन कोटि हुताशन द्युतिकारी। सिर छत्र बिराजै सखि संग भ्राजै निज-निज कारज करधारी।। सुर सिद्ध सुजाना हनै निशाना चढ़े बिमाना समुदाई। बरषहिं बहुफूला मंगल मूला अनुकूला सिय गुन गाई।। देखहिं सबठाढ़े लोचन गाढ़ें सुख बाढ़े उर अधिकाई। अस्तुति मुनि करहीं आनन्द भरहीं पायन्ह परहीं हरषाई ।। ऋषि नारदआये नाम सुनाये सुनि सुख पाये नृप ज्ञानी। सीता असनामा पूरन कामा सब सुखधामा गुन खानी।। सिय सनमुनिराई विनय सुनाई सतय सुहाई मृदुबानी। लालनि तनलीजै चरित सुकीजै यह सुख दीजै नृपरानी।। ...

सीढ़ियों की दिशा: वास्तु के अनुसार, सीढ़ियों की दिशा पूर्व से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण की ओर होना चाहिए।,इसके अलावा सीढ़ी के लिए दक्षिण दिशा बेहद शुभ मानी गई है।,वहीं ईशान कोण में बनी सीढ़ी व्यक्ति के जीवन में हर तरफ से बाधा लाती है।,सीढ़ियों की संख्या: वास्तु के अनुसार, सीढ़ियों की संख्या विषम होनी चाहिए।

https://www.livehindustan.com/astrology/story-vastu-tips-for-home-stair-know-few-vastu-tips-for-stairs-to-get-rid-of-vastu-dosha-and-bring-positivity-in-life-8669923.html https://www.livehindustan.com/astrology/story-vastu-tips-for-home-stair-know-few-vastu-tips-for-stairs-to-get-rid-of-vastu-dosha-and-bring-positivity-in-life-8669923.html

100 % success

विस्वास  manifest  करम  वास्तु  https://youtu.be/4a9aGyEXk6A?si=4CmtSm2WyqW8opsb

मातृपञ्चकम्

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Sanatana Dharma and Indic Knowledge Matrupanchakam by Adi Shankaracharya August 30, 2020  श्रीः         मातृपञ्चकम् written by Adi Shankaracharya,  describes the glory of the mother. This stotra was composed by him while his mother, Aryamba was on her deathbed.The shlokas and explanation of each,in which Adi Shankaracharya glorifies the greatness of the mother and her unmatched love and affection is given below- 1- आस्तां तावदियं प्रसूतिसमये दुर्वारशूलव्यथा     नैरुच्यं तनुशोषणं मलमयी शय्या च सांवत्सरी।     एकस्यापि न गर्भभारभरणक्लेशस्य यस्य क्षमः      दातुं निष्कृतिमुन्नतोSपि तनयः तस्यै जनन्यै नमः।। Oh mother of mine , you bore the extreme pain caused by me while I was born. After being born , you shared the bed which was dirtied by me for an year. Your body became thin and painful. During the nine months that you bore me , and for all these in return , Oh dearest mother , I can never give back or compensate even aft...

bed room ki disha aur rang

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Bed room ki disha E, W, N, S, & SW with colour https://youtube.com/shorts/LSDeZm1nHDU?si=5zOYIcspeu_alQZt

श्रीपरशुरामस्तोत्रं

परशुरामस्तोत्रम् %३९ कराभ्यां परशुं चापं दधानं रेणुकात्मजम् । जामदग्न्यं भजे रामं भार्गवं क्षत्रियान्तकम् ॥ १॥ नमामि भार्गवं रामं रेणुकाचित्तनन्दनम् । मोचिताम्बार्तिमुत्पातनाशनं क्षत्रनाशनम् ॥ २॥ भयार्तस्वजनत्राणतत्परं धर्मतत्परम् । गतगर्वप्रियं शूरंं जमदग्निसुतं मतम् ॥ ३॥ वशीकृतमहादेवं दृप्तभूपकुलान्तकम् । तेजस्विनं कार्तवीर्यनाशनं भवनाशनम् ॥ ४॥ परशुं दक्षिणे हस्ते वामे च दधतं धनुः । रम्यं भृगुकुलोत्तंसं घनश्यामं मनोहरम् ॥ ५॥ शुद्धं बुद्धं महाप्रज्ञामण्डितं रणपण्डितम् । रामं श्रीदत्तकरुणाभाजनं विप्ररञ्जनम् ॥ ६॥ मार्गणाशोषिताब्ध्यंशं पावनं चिरजीवनम् । य एतानि जपेद्रामनामानि स कृती भवेत् ॥ ७॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं श्रीपरशुरामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।