Posts

Showing posts from December, 2021

जगृत और स्वप्न मे एक समान अवस्था(जप योग)

Image
जौं सब कें रह ज्ञान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस॥ माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुन खानी॥3॥ भावार्थ यदि जीवों को एकरस (अखंड) ज्ञान रहे, तो कहिए, फिर ईश्वर और जीव में भेद ही कैसा? अभिमानी जीव माया के वश है और वह (सत्त्व, रज, तम इन) तीनों गुणों की खान माया ईश्वर के वश में है॥3॥ https://youtu.be/ueED0bA2XUo

पांच प्रकार के कोश कौन से है।

मन देही है और आत्मा विदेही है। जब मनुष्य मन को ज्ञान से अंतर्मुखी कर लेता है। तब अन्यमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय कोष, आनंद मय कोष तब आत्मा का स्वरूप प्रगट होता है।

राम जटायु संवाद

https://hindi.webdunia.com/religion/religion/hindu/ramcharitmanas/AranyaKand/7.htm

गिद्ध की श्री राम वंदना

1.3.32 चौपाई गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।। स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी।। छंद जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही। दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही।। पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं। नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं।।1।। बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं। गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं।। जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं। नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं।।2। जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।। करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं।। सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई। मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई।।3।। जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा।। सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी।।4।। दोहा/सोरठा अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम। तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम।।32।।

योग मुद्रा

Image
Do you know! Our Hands Have The Power To Heal  We can create different postures from our hands. They are called ‘Mudras’. It is said that mudras can influence the physical, emotional, and spiritual energies of our body.  There are more than 100 known mudras developed by various ancient Rishis and Yogis. Here are 10 the most powerful mudras 1. Gyan Mudra (Mudra of Knowledge) Use your ring finger to touch the thumb, and keep your other fingers straight out.  Benefits: Improves your creativity, memory, and knowledge. It brings clarity to thoughts and prevents insomnia. Practice: You can do any time while sitting, standing or lying in bed. 2. Prithvi Mudra (Mudra of Earth) Use your ring finger and touch the thumb. Keep other fingers straight out. Benefits: Increases life force, improves your physical and spiritual elements, expands your body functionality Practice: Can be done at anytime. 3.Varuna Mudra (Mudra of water)  Use your pinky finger to touch the thu...

गीता (संकलित – श्रीमद् भगवद् गीता।साधक संजीवनी- श्रीस्वामी रामसुखदासजी।)

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।  अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा ।।6।। श्री भगवान् बोले-   हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत् का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् जगत् का मूल कारण हूँ। व्याख्या (Interpretation Of Sloka 6 | Bhagavad Gita Chapter 7)- जितने भी देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि जंगम (चलने वाले) और वृक्ष-लता, घास आदि स्थावर प्राणी हैं, वे सब-के-सब मेरी अपरा और परा प्रकृति के सम्बन्ध से ही उत्पन्न होते हैं। भगवान् ने बताया है कि स्थावर-जंगम योनियों में उत्पन्न होने वाले जितने शरीर हैं, वे सब प्रकृति के हैं और उन शरीरों में जो बीज अर्थात् जीवात्मा है वह मेरा अंश है। उसी बीज अर्थात् जीवात्मा को भगवान् ने ‘‘परा’’ प्रकृति (7/15) और अपना अंश (15/7) कहा है। स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक आदि सम्पूर्ण लोकों के जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सब-के-सब अपरा और परा प्रकृति के संयोग से ही उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य है कि ‘‘ परा ’’ प्रकृति ने ‘‘ अपरा ’’ को अपना मान लिया है, उसका संग कर लिया है- इसी...

नाम महिमा

कबिरा सब जग निर्धना ,धनवंता न कोय , धनवंता सोइ जानिये ,राम नाम धन होय। काशी में एक दिन गंगाकिनारे भक्त कबीर जी बैठे हुए थे. एक जिज्ञासु ने उनसे जाकर पूछा कि ‘महाराज ! शास्त्रों में जहाँ-तहाँ ज्ञान की बड़ी प्रशंसा की गयी है. परन्तु किसी से अगर ज्ञान के सम्बन्ध में पूछा जाता है तो उत्तर मिलता है कि ज्ञान तो अनहद है; उसकी कोई हद ही नहीं बतलाता. इसलिए क्या करना चाहिए ?’ कबीर जी ने कहा- “पढ़ने की हद समझ है, समझण की हद ज्ञान, ज्ञान की हद हरिनाम है, यह सिद्धांत उर आन.” ज्ञानी भी ज्ञान की कथा कहते-कहते अंत में भगवन्नाम-स्मरण करते हैं और तभी वे शांति पाकर विराम को प्राप्त होते हैं; अतएव तू हरिनाम में चित्त लगा. उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति॥ भावार्थ हे  पार्वती ! श्री  रामजी  के गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं, परन्तु जो भगवान से विमुख हैं और जिनका धर्म में प्रेम नहीं है, वे महामूढ़ (उन्हें सुनकर) मोह को प्राप्त होते हैं। अरब खरब लौं लच्छमी, उदय अस्त लौं राज। तुलसी जौ निज मरन है, तौ आवै कौनै काज...

जप योग(उत्तम योग)

Image
सांस(निरंतर) के द्वारा नाम राम जप को सबसे श्रेष्ठ जप माना जाता है। ये कल्पवृक्ष की तरह है जो लोक और परलोक सुखद बताना है।          -- स्वामी तुलसीदास जप योग पर कथा महाभारत के अश्व मेघ पर्व मे भीष्म एक ब्राह्मण जापक का उदाहरण देते है। जिसने सभी लोको को जीत लिया था।              श्रीगुरु से मंत्रदीक्षा लेकर साधन मंत्र का जप आरंभ करें। जिनके लिए सुभीता हो, वे किसी एकांत पवित्र स्थान में, नदी किनारे अथवा शिवालय में जप करें। जिनके ऐसी सुभीता न हो वे अपने घर में ही जप के लिए कोई रम्य स्थान बना लें। इस स्‍थान में देवताओं, तीर्थों और साधु-महात्माओं के चित्र रखें। उन्हें फूलमाला चढ़ाएं, धूप दें। स्वयं स्नान करके भस्म-चंदन लगाकर चैलाजिन कुशोत्तर आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कंधे पर उपवस्त्र धारण किए, इष्टदेव और गुरु का स्मरण करते हुए आसन पर बैठें। जो नित्य कर्म करने वाले हैं वे पहले संध्या-वंदन कर लें, तब प्रात:काल में सूर्यनारायण को नमस्कार करें, पश्चात देवपूजन करके नित्य पाठ कर लें।    जो संध्या आद...

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।' अर्थात, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।

महाभारत में जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि 'भूमि से भारी कौन?' तब युधिष्ठर जवाब देते हैं-   'माता गुरुतरा भूमेरू।'   अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।      इसके साथ ही महाभारत महाकाव्य के रचियता महर्षि वेदव्यास ने 'मां' के बारे में लिखा है-   ' नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।'   अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और    माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है   तैतरीय उपनिषद में 'मां' के बारे में इस प्रकार उल्लेख मिलता है-   'मातृ देवो भवः।'   अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है।    'शतपथ ब्राह्मण' की  सूक्ति  कुछ इस प्रकार  है-   'अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामः मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेदः।'   अर्थात, जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा।    'मां' के गुणों का उल्लेख करते हुए आग...

अष्ठांग योग(नारद पुराण)

Image
नारद पुराण के अनुसार https://youtu.be/DHW-z5R39N4

मोक्ष प्राप्ति के उपाय(नारद पुराण)

मोक्ष(नारद पुराण) प्राप्ति के उपाय. https://youtu.be/pasForLiFxc

नाम जप क्यों आवश्यक है ?

नाम(reminding गुण, रूप और लीला) अजामिल भीष्म का विष्णु सहस्त्र नाम https://youtu.be/tSQ2ZKTkGIU

मनुष्य का जन्म लिया तो राम राम लो ?

जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका॥ राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥4॥ भावार्थ यद्यपि प्रभु के अनेकों नाम हैं और वेद कहते हैं कि वे सब एक से एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ! रामनाम सब नामों से बढ़कर हो और पाप रूपी पक्षियों के समूह के लिए यह वधिक के समान हो॥4॥ https://youtu.be/XSzeu6Yh1LU

नाम जप से भगवत प्राप्ति संभव है ?

तुलसीदासजी महाराज कहते हैं‒‘बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु’   अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई बात ,  आज सुधर जाय और आज भी अभी-अभी इसी क्षण ,  देरीका काम नहीं ,  क्योंकि ‘होहि राम करे नाम जपु’   तुम रामजीके हो करके अर्थात् मैं रामजीका हूँ और रामजी मेरे हैं‒ऐसा सम्बन्ध जोड़ करके नाम जपो । पर इसमें एक शर्त है‒‘एक बानि करुनानिधान की । सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥’ संसारमें जितने कुटुम्बी हैं, उनमें मेरा कोई नहीं है । न धन-सम्पत्ति मेरी है और न कुटुम्ब-परिवार ही मेरा है अर्थात् इनका सहारा न हो । ‘अनन्यचेताः सततम्’ , ‘अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्’   । https://youtu.be/9lIy-lGl7Vs https://youtu.be/sLbBw-2z83M https://youtu.be/TQdVvwqD_64 https://www.vedicaim.com/2018/08/bhagwan-ka-nam-lene-ki-vidhi.html

संकट-नाश /पीड़ा नाश के लिए चौपाई

संकट-नाश के लिए--- जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।। जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।। दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।' रोग तथा उपद्रवों की शांति के लिए-- दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥' विघ्न शांति के लिए '  सकल विघ्न व्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥' https://hindi.webdunia.com/article/astrology-tantra-mantra-yantra/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%87%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%9F-1-113041700054_2.html

राम नाम का महत्व(स्वामीरामसुखदास महाराज)

राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥ 27॥ भावार्थ- राम नाम नृसिंह भगवान है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करनेवाले जन प्रह्लाद के समान हैं, यह राम नाम देवताओं के शत्रु को मारकर जप करने वालों की रक्षा करेगा॥ 27॥ नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥ ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥ भावार्थ- ब्रह्मा के बनाए हुए इस प्रपंच (दृश्य जगत) से भली-भाँति छूटे हुए वैराग्यवान मुक्त योगी पुरुष इस नाम को ही जीभ से जपते हुए जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं। जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥ साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥ भावार्थ- जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को (यथार्थ महिमा को) जानना चाहते हैं, वे (जिज्ञासु) भी नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं। (लौकिक सिद्धियों के चाहनेवाले अर्थार्थी) साधक लौ लगाकर नाम का जप करते हैं और अणिमादि (आठों) सिद्धियों को पाकर सिद्ध हो जाते हैं। चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥ चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम...

जानिए पितृ ऋण देव ऋण और ऋषि ऋण के विषय मे

जानिए देव ऋण के बारे में...   1.देव ऋण :  माना जाता है कि देव ऋण भगवान विष्णु का है। यह ऋण उत्तम चरित्र रखते हुए दान और यज्ञ करने से चुकता होता है। जो लोग धर्म का अपमान करते हैं या धर्म के बारे में भ्रम फैलाते या वेदों के विरुद्ध कार्य करते हैं, उनके ऊपर यह ऋण दुष्प्रभाव डालने वाला सिद्ध होता है।   खास उपाय :  प्रतिदिन सुबह और शाम संध्यावंदन करें और विष्णु, कृष्ण और हनुमानजी में से किसी एक के मंत्र, चालीसा, पाठ या स्तोत्र का जप करें। सिर पर चंदन का तिलक लगाएं। उत्तम और सात्विक भोजन करें। धर्म का प्रचार-प्रसार करें या धर्म के लिए दान करें। देवी-देवताओं आदि का सम्मान और उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करें। किसी भी प्रकार से न धर्म का अपमान सहें और न करें। हिन्दू हैं तो हिन्दू कर्म और स्वभाव के बनें।   ऋषि ऋण को जानिए...   2.ऋषि ऋण :  यह ऋण भगवान शंकर का है। वेद, उपनिषद और गीता पढ़कर उसके ज्ञान को सभी में बांटने से ही यह ऋण चुकता हो सकता है। जो व्यक्ति ऐसा नहीं करता है उससे भगवान शिव और ऋषिगण सदा अप्रसन्न ही रहते हैं। इससे व्यक्ति का जीवन घोर संकट में घिरता जात...