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Showing posts from April, 2022

श्रीमन्नारायणाष्टकम्

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🚩🚩. श्रीमन्नारायणाष्टकम्. 🚩🚩  वात्सल्यादभयप्रदानसमयादार्तार्तिनिर्वापणा दौदार्यादघशोषणादगणितश्रेय : पदप्रापणात् । सेव्य : श्रीपतिरेक एव जगतामेतेऽभवन्साक्षिण : प्रह्लादश्च विभीषणश्च करिराट् पाञ्चाल्यहल्या ध्रुवः ॥ १ ॥  अति वात्सल्यमय होनेके कारण , भयभीतोंको अभयदान देनेका स्वभाव होनेके कारण , दुःखी पुरुषोंका दुःख हरनेके कारण , अति उदार और पापनाशक होनेके कारण और अन्य अगणित कल्याणमय पदों ( श्रेयों ) की प्राप्ति करा देनेके कारण सारे जगत् के लिये भगवान् लक्ष्मीपति ही सेवनीय हैं! क्योंकि प्रह्लाद , विभीषण , गजराज , द्रौपदी , अहल्या और ध्रुव - ये ( क्रमसे ) इन कार्योंमें साक्षी हैं ॥ १ ॥  ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

ध्यान

ध्यान एक यौगिक प्रक्रिया है। ध्यानयोग की चरम उपलब्धि है - "समाधि"।      बिना समाधि को उपलब्ध हुए अन्तर्जगत् में प्रवेश नहीं किया जा सकता। अंतर्जगत का अर्थ है - सूक्ष्म जगत। जब तक सूक्ष्म जगत में प्रवेश कर, सूक्ष्म शरीर द्वारा साधना प्रारंभ नहीं की जाती तब तक अध्यात्म का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। स्थूल शरीर से हज़ारों वर्ष साधना करते रहने से कोई उपलब्धि प्राप्त नहीं होती। मात्र स्वयं को भ्रान्ति में डाले रहना है कि हम साधना कर रहे हैं। साधना करना और साधना करने का भ्रम पालना अलग अलग है। जो व्यक्ति यह कहता है कि वह साधना करते हुए उस उच्च अवस्था को प्राप्त हो चुका है, जिसे समाधि की अवस्था कहते हैं, तो बहुत कुछ सम्भव है कि वह साधना- साधना कह कर साधना की मादकता में डूब जाने को ही साधना समझता हो।         साधना और साधना समझने की मादकता में ज़मीन-आसमान का अन्तर है। बहुत से साधक जो अटल नहीं है, केवल भजनानंदी ही हैं। वह भजन- कीर्तन, पूजा - उपासना को ही साधना समझते हैं और उसी में मस्त रहते हैं।        पूजा-उपासना, भजन-कीर्तन का अपना मह...

mahabharat

ऊर्ध्वबाहुर्विरोम्येष न च कश्चित् शृणोति मे । धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ।। मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते ।-वेदव्यास  Amongst all scriptures, Gita is classic amongst all, Bhagwan Shri Hari is the superior most, Ganga is the greatest Tirthas and Manu has the complete knowledge of Vedas! ~ Mahabharat, BP 2.43 ~  गीता सर्वशास्त्रमयी है, भगवान श्रीहरि सर्वदेवमय हैं, गंगा सर्वतीर्थमयी है और मनु सर्ववेदमय हैं। ~ महाभारत,भीष्मवध पर्व २.४३ ~ येन येन शरीरेण करोत्ययमनीश्वरः । तेन तेन शरीरेण तदवश्यमुपाश्नुते । मानसं मनसाऽऽप्नोति शरीरं च शरीरवान् । यह पराधीन जीव जिस-जिस शरीरसे कर्म करता है, उस-उस शरीरसे उसका फल अवश्य भोगता है। मानस कर्मका फल मनसे और शारीरिक कर्मका फल शरीर धारण करके भोगता है । -महाभारत  वियोगे दोषदर्शी यः संयोगं स विसर्जयेत् । असङ्गे सङ्गमो नास्ति दुःखं भूवि वियोगजम् ।। जो वियोगमें दोष देखता है, वह संयोगका त्...

gajendra moksha (saar)

Apno se vairagy aur hari naam ki mhatta https://youtu.be/04ThclitK-A

mrittyujay yog ( bhagvan krishn & udhav sanvad)

Alwage remember to ram with working or not working condition https://youtu.be/uGqMulHlDjE

जाके प्रिय न राम-बदैही

जाके प्रिय न राम-बदैही तुलसीदास जाके प्रिय न राम-बदैही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥ तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी। बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥ नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेब्य कहौं कहाँ लौं। अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं॥ तुलसी सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रानते प्यारो। जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥ जिसे श्री राम-जानकी जी प्यारे नहीं, उसे करोड़ों शत्रुओं के समान छोड़ देना चाहिए, चाहे वह अपना अत्यंत ही प्यारा क्यों न हो। प्रह्लाद ने अपने पिता (हिरण्यकशिपु) को, विभीषण ने अपने भाई (रावण) को और ब्रज-गोपियों ने अपने-अपने पतियों को त्याग दिया, परंतु ये सभी आनंद और कल्याण करने वाले हुए। जितने सुहृद् और अच्छी तरह पूजने योग्य लोग...

अच्छी चौपाइयां और दोहे

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तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी॥ अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय॥3॥ भावार्थ आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभाव से ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित), अखंड, निर्गुण (मायिक गुणों से रहित), अजन्मे, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती) और दयामय हैं॥3॥ जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान। जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥42॥ भावार्थ सनकादि मुनि जैसे जीवन्मुक्त और ब्रह्मनिष्ठ पुरुष भी ध्यान (ब्रह्म समाधि) छोड़कर श्री रामजी के चरित्र सुनते हैं। यह जानकर भी जो श्री हरि की कथा से प्रेम नहीं करते, उनके हृदय (सचमुच ही) पत्थर (के समान) हैं॥42॥ 🌹 श्री भगवान से प्रकट होने की प्रार्थना 🌹  जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा । अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा ॥ जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा । निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा ॥  जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा ।  भावार्थ : - हे अविनाशी , सबके हृदयमें निवास करनेवाले ( अन्तर्यामी...

अनुगीता (महाभारत)

तत्त्वज्ञ जीव अपने-आपको शरीरसे पृथक् देखता है। वह शरीरके भीतर रहकर भी उसका त्याग करे-उसकी पृथक्ताका अनुभव करके अपने स्वरूपभूत केवल परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करता हुआ बुद्धिके सहयोगसे आत्माका साक्षात्कार करता है।उस समय वह यह सोचकर हँसता-सा रहता है कि अहो! मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मुझमें ही प्रतीत होनेवाले इस संसारने मुझे अबतक व्यर्थ ही भ्रममें डाल रखा था। -अनुगीता-१९/५०,५१ -महाभारत The enlightened soul sees himself as separate from the body.  He should renounce it even while living within the body - after experiencing its separateness, contemplating only Parabrahman Paramatma in his form, the intellect  Realizes the soul with co-operation.  Like the water that appears in a mirage, this world which appears in me till now has kept me in vain illusions. मुनिको उचित है कि चिन्तनके द्वारा चेतना (सम्यग्ज्ञान) पाकर मन और इन्द्रियोंको एकाग्र करके परमात्माके ध्यान में स्थित हो जाय; क्योंकि जिसका चित्त जिसमें लगा होता है, वह निश्चय ही उसका स्वरूप हो जाता है—यह सनातन ...