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Showing posts from May, 2022

श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम्

🌹🌹श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् ' 🌹🌹 शृण्वतां स्वकथां कृष्ण : पुण्यश्रवणकीर्तनः । हृद्यन्त : स्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥  अर्थात = भगवान् श्रीकृष्णके यशका श्रवण और कीर्तन दोनों पवित्र करनेवाले हैं । वे अपनी कथा सुननेवालोंके हृदयमें आकर स्थित हो जाते हैं !और उनकी अशुभ वासनाओंको नष्ट कर देते हैं , क्योंकि वे संतोंके नित्य सुहृद् हैं ॥  ॐ नमो नारायण ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹 दिएँ पीठि पाछें लगै सनमुख होत पराइ । तुलसी संपति छाँह ज्यों लखि दिन बैठि गँवाइ ॥ - ॐ  भावार्थ - तुलसीदासजी कहते हैं कि सम्पत्ति शरीरकी छायाके समान है । इसको पीठ देकर चलनेसे यह पीछे - पीछे चलती है और सामने होकर चलनेसे दूर भाग जाती है । जो धनसे मुँह मोड़ लेता है , धनकी नदी उसके पीछे - पीछे बहती चली आती है और जो धनके लिये सदा ललचाता रहता है , उसे सपनेमें भी पैसा नहीं मिलता ।  इस बातको समझकर घर बैठकर ही दिन बिताओ ( अर्थात् संतोषसे रहो और भगवान् का भजन करो ) ॥ २५७ ॥   नमो नारायण ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌹

शास्त्र

प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा । पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते ||'  (श्लोकवार्तिक, शब्दपरिच्छेद, श्लोक 4) ‘जिससे मनुष्य को नित्यकर्म में प्रवृत्ति और कृतककर्म से निवृत्ति का उपदेश किया जाय उसको ‘शास्त्र' कहते हैं ।’ जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः । जीविताशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति ॥  'बूढ़े होनेवाले मनुष्य के बाल पक जाते हैं, उसके दाँत भी टूटने लगते हैं, परंतु धन और जीवनकी आशा उस मनुष्यके जीर्ण होनेपर भी जीर्ण ( शिथिल ) नहीं होती। यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् || 'संसारमें जो कामजनित सुख है तथा जो दिव्य महान् सुख हैं, वे सब मिलकर तृष्णा-क्षयसे होनेवाले सुखके सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते'। 'खोटी बुद्धिवाले पुरुषोंद्वारा जिसका त्याग होना कठिन है, जो मनुष्यके बूढ़े होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राण-नाशक रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग करनेवालेको ही सुख मिलता है। न छन्दांसि वृजिनं तारयन्ति मायाविनं मायया वर्तमानम् । छन्दांस्येनं प्रजहत्यन्तकाले नीडं शक...

न्यायसूत्र

मोक्ष के लिये आत्मविद्या का लगातार पढ़ना, सुनना, और विचार करना तथा अध्यात्म शास्त्र जानने वालों के साथ बुद्धि की परिपक्वता के लिये सदा वार्तालाप करना चाहिये, उससे सन्देह की निवृत्ति, विषयों का बोध और निश्चित अभ्यनुज्ञान होते हैं।  #न्यायसूत्र असूया रहित शिष्य, गुरु, सहाध्यायी उत्कृष्ट ज्ञानवान् और मुमुक्षु, इनके द्वारा अध्यात्म विद्वान् से सत्संग करे। किसी पदार्थ इच्छुक की जब कामना पूरी हो जाती, तब झट दूसरी कामना इसे दुःख देने लगती है । यदि समुद्र पर्यन्त यह पृथिवी इसे मिलजाय, तो भी इस की तृप्ति न होगी किन्तु दूसरी इच्छा उत्पन्न हो जायगी।  -न्यायदर्शन

काकभुशुण्डि का अपनी पूर्व जन्म कथा और कलि महिमा कहना (ram tatv)

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श्रीरामचरितमानस Read SHRIRAMCHARITMANAS in Awadhi, Hindi and English - Baal Kand, Ayodhya Kand, Aranya Kand, Kishkindha Kand, Sundar Kand, Lanka Kand and Uttar Kand काकभुशुण्डि का अपनी पूर्व जन्म कथा और कलि महिमा कहना चौपाई : * सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई।। जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही॥1॥  भावार्थ:- हे पक्षीराज गरुड़जी! श्री रघुनाथजी की प्रभुता सुनिए। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ। हे प्रभो! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ॥1॥ * राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता॥ ताते नहिं कछु तुम्हहि दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ॥2॥  भावार्थ:- हे तात! आप श्री रामजी के कृपा पात्र हैं। श्री हरि के गुणों में आपकी प्रीति है, इसीलिए आप मुझे सुख देने वाले हैं। इसी से मैं आप से कुछ भी नहीं छिपाता और अत्यंत रहस्य की बातें आपको गाकर सुनाता हूँ॥2॥ *सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ॥ संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना॥3॥  भावार्थ:- श्री रामचंद्रजी का सहज स्वभाव सुनिए। व...

भगवान्के प्रिय भक्तोंकी महिमा

🌹🌹भगवान्के प्रिय भक्तोंकी महिमा 🌹🌹 हरि के जे वल्लभ हैं दुर्लभ भुवन माँझ तिनहीं की पदरेणु आसा जय करी है । योगी यती तपी तासों मेरो कछु काज नाहिं प्रीति परतीत रीति मेरी मति हरी है । कमला गरुड़ जाम्बवान सुग्रीव आदि सबै स्वाद रूप कथा पोथिन में धरी है ।  प्रभुसों सचाई जग कीरति चलाई अति मेरे मन भाई सुखदाई रस भरी है ॥ २६ ॥  अर्थात = जो भगवान्के प्यारे भक्त हैं  वे चौदहों भुवनोंमें दुर्लभ हैं मैंने उन्हींकी चरणरेणुको प्राप्त करनेकी आशा की है । भक्तिहीन जो कोरे योगी  संन्यासी और तपस्वी हैं  उन लोगोंसे मेरा कुछ भी प्रयोजन नहीं है । भक्तोंकी प्रीति , विश्वास और उपासनाकी रीतिने मेरी बुद्धिको अपनी ओर खींच लिया है । लक्ष्मी , गरुड़ , जाम्बवान् और सुग्रीव आदिकी अति मधुर कथाएँ पुराण आदि ग्रन्थों में लिखी हैं  जिन भक्तोंने प्रभुसे निष्कपट सच्चा प्रेम किया तथा संसारमें अपनी और भगवान्‌की कीर्ति फैलायी ,उनकी वह रसमयी मधुर गाथा मेरे मनको बहुत अच्छी लगी ; क्योंकि वह सुनने - सुनानेमें हृदयको सुख देनेवाली है ॥ २६ ॥ जय श्रीमन्नारायण जय श्री सीताराम🌹 स्त्रोत : - श्रीनाभादासजीकृत...

सदन नामक कसाई जाति के एक भक्त हुए थे। बचपन से भगवन्नाम-जप और हरि कीर्तन इन्‍हें प्रिय था। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था।

परिचय प्राचीन समय में सदन नामक कसाई जाति के एक भक्त हुए थे। बचपन से भगवन्नाम-जप और हरि कीर्तन इन्‍हें प्रिय था। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर सदा ही नाचता रहता था। यद्यपि ये जाति से कसाई थे, फिर भी इनका हृदय दया से पूर्ण था। जीव-वध के नाम से ही इनका शरीर काँपने लगता था। आजीविका के लिये और कोई उपाय न होने से दूसरों के यहाँ से मांस लाकर बेचा करते थे, स्‍वयं अपने हाथ से पशु-वध नहीं करते थे। इस काम में भी इनका मन लगता नहीं था, पर मन मारकर जाति-व्‍यवसाय होने से करते थे। सदा नाम-जप, भगवान के गुण-गान और लीलामय पुरुषोत्तम के चिन्‍तन में लगे रहते थे। सदन का मन श्री हरि के चरणों में रम गया था। रात-दिन वे केवल ‘हरि-हरि’ करते रहते थे। भगवान अपने भक्त से दूर नहीं रहा करते। भक्त को जैसे उनके बिना चैन नहीं, वैसे ही उन्‍हें भी भक्त के बिना चैन नहीं। सदन के घर में भगवान शालग्राम रूप में विराजमान थे। सदन को इसका पता नहीं था। वे तो शालग्राम को पत्‍थर का एक बाट समझते थे और उनसे मांस तौला करते थे। [1]

लिंगाष्टकम (अष्ट दरिद्र का होगा नाश)

लिंगाष्टकम स्तोत्र (Lingastakam Stotra) ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगम् निर्मलभासित शोभित लिंगम्। जन्मज दुःख विनाशक लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥1॥ देवमुनि प्रवरार्चित लिंगम् कामदहन करुणाकर लिंगम्। रावणदर्प विनाशन लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥2॥ सर्वसुगन्धि सुलेपित लिंगम् बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम्। सिद्ध सुरासुर वन्दित लिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥3॥ कनक महामणि भूषित लिंगम् फणिपति वेष्टित शोभित लिंगम् । दक्ष सुयज्ञ विनाशन लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥4॥ कुंकुम चन्दन लेपित लिंगम्  पंकज हार सुशोभित लिंगम् ।  सञ्चित पाप विनाशन लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥5॥ देवगणार्चित सेवित लिंगम् भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्। दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगम्  तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥6॥ अष्टदलो परिवेष्टित लिंगम्  सर्व समुद्भव कारण लिंगम्। अष्टदरिद्र विनाशित लिंगम्  तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥7॥ सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगम्  सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम्। परात्परं परमात्मक लिंगम्  तत् प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥8॥ लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ...

राम स्तुति

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गोस्वामी तुलसीदास विरचित श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड राम जन्म भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी । हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ॥ लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी । भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी ॥ कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता । माया गुअन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता ॥ करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता । सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रकट श्रीकंता ॥ ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै । मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ॥ उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै । कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥ माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा । कीजे सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा ॥ सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा । यह चरित जे गावहि हरिपद पावहि ते न परहिं भवकूपा ॥ बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार । निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥ ...