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Showing posts from October, 2022

विनय पत्रिका

दुष्ट विबुधारी-संघात, अपहरण महि-भार, अवतार कारण अनूपं। अमल, अनवद्य, अद्वैत, निर्गुण, सगुण, ब्रह्म सुमिरामि नरभूप-रुपं॥ शेष श्रुति शारदा शंभु, नारद सनक गनत गुन, अंत नहिं तव चरित्रं। सोइ राम कामारि, प्रिय अवधपति सर्वदा दासतुलसी-त्रास-निधि वहित्रं॥ देवताओंके शत्रु दुष्ट राक्षसोंके समूहका, जो पृथ्वीपर भाररुप था, संहार करनेके लिये अवतार लेनेमें उपमारहित कारणवाले, निर्मल, निर्दोष, अद्वैतरुप, वास्तवमें निर्गुण, मायाको साथ लेकर सगुण, परब्रह्म नररुप राजराजेश्वर श्रीरामका मैं स्मरण करता हूँ॥ शेषजी, वेद, सरस्वती, शिवजी, नारद और सनकादि सदा जिनके गुण गाते हैं, परंतु जिनकी लीलाका पार नहीं पा सकते, वही शिवजीके प्यारे अयोध्यानाथ श्रीराम इस तुलसीदासको दुःखरुपी समुद्र से पार उतारने के लिये सदा सर्वदा जहाजरुप हैं॥ (विनय पत्रिका) जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा॥ सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा॥ सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा॥ ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अकिल अमोघसक्ति भगवंता॥ अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता॥ निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरं...

hanuman

जयति वेदान्तविद विविध-विद्या-विशद, वेद-वेदांगविद ब्रह्मवादी। ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य-भाजन विभो, विमल गुण गनति शुकनारदादी॥ आप वेदान्त के ज्ञाता, नाना विद्याओं में विशारद, चार वेद, छ: वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) के ज्ञाता व शुद्ध ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण करने वाले है। ज्ञान, विज्ञान व वैराग्य से समर्थ है।इसीसे शुकदेव व नारद आदि देवर्षि सदा आपकी निर्मल गुणावली गाया करते है॥

राम

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राम एव परं ब्रह्म राम एव परं तपः। राम एव परं तत्त्वं श्री रामो ब्रह्म तारकम्॥ -श्री रामरहस्योपनिषद (हनुमान जी का सनकादि, योगीन्द्र तथा प्रह्लाद जी को उपदेश) रामस्य नाम रूपं च लीला धाम परात्परम् । एतच्चतुष्टयं सर्वं सच्चिदानन्दविग्रहम्। रामका नाम , रूप , लीला और धाम - चारों ही परात्परस्वरूप हैं। भगवन्नाम स्वयंमें परात्पर परब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रह, सास  बभसससस है..!!  दोहा : जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल सो कृपाल मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल॥124 क॥ जिनका नाम जन्म-मरण रूपी रोग की (अव्यर्थ) औषध और तीनों भयंकर पीड़ाओं (आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखों) को हरने वाला है, वे कृपालु श्री रामजी मुझ पर और आप पर सदा प्रसन्न रहें॥124 (क)॥ चौपाई राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥ नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥ भावार्थ- राम ने भक्तों के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया, परंतु भक्तगण प्रेम के साथ नाम का जप करते हुए सहज ही में आनंद और कल्याण के घर हो जाते हैं। राम एक तापस तिय तारी    राम एक ताप...

trividh tapo se chhutne Ka Upay

https://youtu.be/UWnQFL48EGM

मन

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मन इस शरीर का राजा और सामान्य जीव अवस्था में नियंत्रणकर्ता है । इसीलिए मन को शेर कहते है यह अष्टदल कमल पर चक्कर काटता रहता है । और विषय विकारों में फ़ँसा होने के कारण एकाग्र नहीं होता  विकारों में प्रवृति होने के कारण यह जीव को भक्ति मार्ग की और मुङने नहीं देता, और नाना प्रकार के पाप कर्मों में उलझाये रखता है । अष्टदल कमल की जिस पत्ती पर ये होता है । जीव को उसी के अनुसार कर्म में प्रवृत्त करता है   अष्टदल कमल की ये आठ पत्तिंया कृमश ------- 1- काम 2- क्रोध 3- लोभ 4- मोह 5- मद (घमंड ) 6- मत्सर (जलन) 7- ग्यान 8- वैराग हैं । मन शब्द प्रचलन में अवश्य है पर इसका वास्तविक नाम " अंतकरण " है । हमारे शरीर के अंदर पाँच तत्वों की पच्चीस प्रकृतियाँ ( एक तत्व की पाँच ) हैं । तो 25 प्रकृति + 5 ग्यानेन्द्रिया + 5 कर्मेंन्द्रियां + 5 तत्वों के शरीर का नियंत्रणकर्ता और राजा मन है अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मुझमे निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम मैं वहन करता...

yog in Gita

#BhagavadGita अध्याय: ०५, श्र्लोक: २७-२८ स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥  समस्त बाह्य इन्द्रियाँ सुख के विषयों का विचार न कर अपनी दृष्टि को भौहों के बीच के स्थान में स्थित कर नासिका में विचरने वाली भीतरी और बाहरी श्वासों के प्रवाह को सम करते हुए इन्द्रिय, मन और बुद्धि को संयमित करके जो ज्ञानी कामनाओं और भय से मुक्त हो जाता है, वह सदा के लिए   मुक्त हो जाता है।

भगवान श्री विष्णु के १६ नामों का एक छोटा श्लोक

..... || श्रीहरि: विष्णु || ..... भगवान श्री विष्णु के १६ नामों का एक छोटा श्लोक प्रस्तुत कर रही हूं । इसमें मनुष्य को किस किस अवस्थाओं में भगवान विष्णु को किस किस नाम से स्मरण करना चाहिए, इसका उल्लेख किया गया है। औषधे चिंतयते विष्णुं , भोजन च जनार्दनम | शयने पद्मनाभं च विवाहे च प्रजपतिं || युद्धे चक्रधरं देवं प्रवासे च त्रिविक्रमं | नारायणं तनु त्यागे श्रीधरं प्रिय संगमे || दु:स्वप्ने स्मर गोविन्दं संकटे मधुसूदनम् | कानने नारसिंहं च पावके जलशायिनाम || जल मध्ये वराहं च पर्वते रघुनन्दनम् | गमने वामनं चैव सर्व कार्येषु माधवम् || षोडश एतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत । सर्व पाप विनिर्मुक्ते, विष्णुलोके महियते ।।

योगनिद्रास्तुति

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{योगनिद्रास्तुति:} ऊँ विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्। निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजस: प्रभु:।।1।। अर्थ –  जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरुप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रा देवी की भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे.                     ब्रह्मोवाच त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कार: स्वरात्मिका। सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।।2।। अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषत:। त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।।3।। अर्थ –  देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्ही स्वधा और तुम्ही वषटकार हो. स्वर भी तुम्हारे ही स्वरुप हैं. तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो. नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार – इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो तथा इन मात्राओं के अतिरिक्त जो विन्दुरुपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रुप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो. देवि! तुम्ही संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो.   त्वयैतद्ध...

tulsi Puja for wealth

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Maha Lakshmi strotram