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Showing posts from September, 2022

hangman mantra for calling

मंत्र:  कालतंतु कारेचरन्ति एनर मरिष्णु , निर्मुक्तेर कालेत्वम अमरिष्णु।। यह है आवश्यक :  इस मंत्र के जाप करने से भगवान के प्रगट होने की मान्यता हैं, लेकिन इसके लिए कुछ नियम है।   इस मंत्र के जाप के समय भक्त को अपनी आत्मा के हनुमानजी के साथ संबंध का बोध होना चाहिए । त्रेतायुग के अंत में जब भगवान् राम बैकुंठ धाम को पधार गए थे उस वक़्त कोई था जो कलियुग के अंत तक धरती पर भगवान् राम की भक्ति और जन कल्याण हेतु रुका l कलियुग में एकमात्र भगवान् बजरंग बली है जिनका अस्तित्व आपको इस धरातल पर मिलेगा जो आपको बताएगा की हिन्दू धर्म कितना प्राचीन और महत्वपूर्ण है l आप जो अब पढने जा रहे है वो न ही सिर्फ दिलचस्प है बल्कि अविश्वसनीय भी, इसे पढने और जानने के बाद आपका भगवान् के प्रति श्रधा व विश्वास और दृढ होगा….जय बजरंग बली ! आगे जानिये की रामायण काल खत्म होते ही हनुमान जी  कहा और किस जगह साक्षात भ्रमण करते रहे और उन्होंने कौन सा ऐसा मन्त्र दिया जिसके जाप से वो स्वयं प्रगट हो जाते है पर उस मन्त्र के जाप के लिए भी आपको 2 शर्ते पूरी करनी पड़ती है, और आज के वक़्त को देखते हुए हर किसी में इ...

use of ram naam

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लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड। भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड॥  लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन! तू उन श्रीराम जी का निरन्तर स्मरण क्यों नहीं करता है? अंहकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान। मनुज बास सचराचर रुप राम भगवान्।।  शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चंद्रमा मन हैं और महान् (विष्णु) ही चित्त हैं। उन्हीं चराचर रूप w राम ने मनुष्य रूप में निवास किया है॥ राम नाम कलि कामतरु राम भगति सुरधेनु। सकल सुमंगल मूल जग गुरुपद पंकर रेनु॥ राम नाम कलि कामतरु सकल सुमंगल कंद। सुमिरत करतल सिद्धि सब पग पग परमानंद॥ कलियुग में रामनाम मनचाहा फल देने वाले कल्प वृक्ष के समान है, रामभक्ति मुँहमाँगी वस्तु देने वाली कामधेनु है, श्रीसद्गुरु के चरणकमल की रज संसार में सब प्रकार के मंगलों की जड़ है॥ श्रीराम का नाम कलियुग में कल्पवृक्ष के समान है और सब प्रकार के श्रेष्ठ मंगलों का परम सार है।रामनाम के स्मरण से ही सब सिद्धियाँ वैसे ही प्राप्त हो जाती हैं, जैसे कोई चीज हथेली में ही रखी हो और पद-पद पर परम आनन्द की प्राप्...

बृहस्पतिकवचम्

बृहस्पति ने प्रभास तीर्थ के तट  भगवान शिव  की अखण्ड तपस्या कर देवगुरु की पदवी पायी। तभी  भगवान शिव  ने प्रसन्न होकर इन्हें  नवग्रह  में एक स्थान भी दिया। कच बृहस्पति का पुत्र था या भ्राता ,  इस विषय में मतभेद हैं। किन्तु महाभारत के अनुसार कच इनका भ्राता ही था।  भारद्वाज गोत्र  के सभी ब्राह्मण इनके वंशज माने जाते हैं।  बृहस्पति(गुरु) के इस बृहस्पतिकवचम् के पाठ करने से सभी क्षेत्र में विजय कि प्राप्ति होती है। बृहस्पतिकवचम् अस्य श्रीबृहस्पतिकवचस्तोत्रमन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः , अनुष्टुप् छन्दः ,  गुरुर्देवता ,  गं बीजं ,  श्रीशक्तिः , क्लीं कीलकं ,  गुरुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः । अभीष्टफलदं देवं सर्वज्ञं सुरपूजितम् । अक्षमालाधरं शान्तं प्रणमामि बृहस्पतिम् ॥ १॥ बृहस्पतिः शिरः पातु ललाटं पातु मे गुरुः । कर्णौ सुरगुरुः पातु नेत्रे मेऽभीष्टदायकः ॥ २॥ जिह्वां पातु सुराचार्यो नासां मे वेदपारगः । मुखं मे पातु सर्वज्ञो कण्ठं मे देवतागुरुः ॥ ३॥ भुजावाङ्गिरसः पातु करौ पातु शुभप्रदः । स्तनौ मे पातु वागीशः कुक्षिं मे शुभलक्षणः ॥ ४॥ नाभि...

राम का जाप मन का विचार-रुपी अमृत है।

|| श्री राम || राम का जाप मन का विचार-रुपी अमृत है। राम-राम प्रभु राम, अमृत-संवाद है | राम-ध्यान, चित द्वारा किया गया अमृत-चिंतन है। अर्थात राम शब्द में जप, धारणा, ध्यान सब कुछ का सच्चा उत्तर समाहित है।  राम शब्द इन सभी अभ्यासों के लिए उपयुक्त है | मनन, जाप, अलाप, चिंतन, ध्यान, समाधान सभी राम-नाम के साथ सम्बधित्त होकर अमृत हो जाते हैं | जाप शब्द का होता है और मनन अर्थ का, अलाप स्वर का और चिंतन तत्त्व का होता है | ध्यान स्वरुप का तथा समाधान (समाधी) में त्रिपुटी (ध्येय, ध्याता, सुध्यान) का लय होता है | अमृत मनन राम का जाप, राम - राम प्रभु राम अलाप। अमृत चिंतन राम का ध्यान, राम शब्द में शुचि समाधान॥५॥ राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम काशी गुप्त काशी गुप्त काशी गुप्त Read more at: https://www.mymandir.com/p/8kqo4b

bhakti

चौपाई कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा। सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥1॥ भावार्थ कहो तो,  भक्ति  मार्ग में कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योग की आवश्यकता है, न  यज्ञ , जप, तप और उपवास की! (यहाँ इतना ही आवश्यक है कि) सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसी में सदा संतोष रखे॥1 कलियुग सम युग आन नहिं,जो नर कर विश्वास. गाई राम गुणगन विमल,भवतर विनहिं प्रयास. जिस भवसागर को पार करने के लिये सतयुग में ध्यान त्रेता में यग्य और द्वापर में पूजा जैसी कठिन मार्ग ही अबलम्बन था उसी भव सागर को पार करने के लिये कलियुग के मानवों को केवल रामनाम गुण रामकथा का श्रवण मनन-गायन के माध्यम से प्रभु ने सरल सुगम मार्ग प्रशस्त किया है. यहि कलिकाल न साधन दूजा,योग यग्य जप तप व्रत पूजा. रामहिं सुमिरिय गाईय रामहिं,संतत सुनिय रामगुण ग्रामहिं. भक्ति के लिए भजनीय के सम्बन्ध में निश्चय होना चाहिए कि हमें किस की भक्ति करनी है। 'माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढ़ः सर्वतोऽधिकः । स्नेहो भक्ति - रितिख्याता तया मुक्तिर्न चान्यथा' । (ब्रह्मतर्क श्लोक, महाभा० ता० नि०१.८६ में उद्धृत) ...

अनंत सूत्र बांधने का मंत्र

नमस्ते देवदेवेश सर्वव्यापिन् जनार्दन। सत्त्वादिगुणभेदेन लोकव्यापारकारिणे। नमस्ते बहुरूपाय अरूपाय नमो नमः। सर्वैकाद्भुतरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने। नमस्ते लोकनाथाय परमज्ञानरूपिणे। सद्भक्तजनवात्सल्यशीलिने मङ्गलात्मने।। तमादिपुरुषं देवं नमामीष्टार्थसिद्धये।  इस स्तोत्र के पाठ से भगवान विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। उन्हें सुख-संपत्ति और संतान की प्राप्ति होती है। अनंत सूत्र बांधने का मंत्र- अनंत संसार महासमुद्रेमग्नं समभ्युद्धर वासुदेव। अनंतरूपे विनियोजयस्वह्यनंतसूत्राय नमो नमस्ते।।

शिवकृत:श्रीविष्णुस्तोत्रम्

शिवकृत:श्रीविष्णुस्तोत्रम् नमस्ते देवतानाथ नमस्ते गरुडद्ध्वज। शङ्खचक्रगदापाणे वासुदेव नमोऽस्तु ते।। नमस्ते निर्गुणानन्त अप्रतर्क्याय वेधसे। ज्ञानाज्ञान निरालम्ब सर्वालम्ब नमोऽस्तु ते॥ रजोयुक्त नमस्तेऽस्तु ब्रह्ममूर्ते सनातन। त्वया सर्वमिदं नाथ जगत्सृष्टं चराचरम्।। जय श्रीहरि 

niti

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥ अर्थात पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुएँ अच्छी होती हैं और न नयी होने से बुरी तथा हेय। विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूर्ख लोग दूसरों द्वारा बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं। क्षणे रुष्टा: क्षणे तुष्टा: रुष्टे तुष्टे क्षणे क्षणे।  अव्यवस्थित चित्तानाम् प्रसादोऽपि भयंकर:।।  जिनका मन पल पल बदलता रहता है उनकी दोस्ती व उनसे बैर दोनों ही कष्टप्रद होते हैं । ऐसे लोगों से दूर के सम्बन्ध ही हितकर है । व्याघ्रः सेवति काननं च गहनं सिंहो गुहां सेवते हंसः सेवति पद्मिनीं कुसुमितां गृधः श्मशानस्थलीम्। साधुः सेवति साधुमेव सततं नीचोऽपि नीचं जनम् या यस्य प्रकृतिः स्वभावजनिता केनापि न त्यज्यते॥ अर्थात:- शेर घने जंगल में, और सिंह गुफा में रहता है; हंस विकसित कमलिनी के पास रहना पसंद करता है, गीध को श्मशान अच्छा लगता है । वैसे ही सज्जन, सज्जन की और नीच पुरुष नीच की सोहबत करता है; यानी की जन्मजात स्वभाव किसी से छूटता...

राम नाम जप की महत्ता – भक्त तुलसीदास जी दोहावली

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राम नाम जप की महत्ता – भक्त तुलसीदास जी दोहावली चित्रकूट सब दिन बसत प्रभु सिय लखन समेत| राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत||  प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि भगवान श्रीरामचंद्रजी श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मणजी के साथ चित्रकूट में हमेशा निवास करते हैं| राम-नाम का जप करने वाले को वे मनचाहा फल प्रदान करते हैं|प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि छ: मास तक केवल दुग्ध का आहार करके अथवा केवल फल खाकर राम-नाम का जप करो| ऐसा करने से हर प्रकार के सुमंगल ओर सब सिद्धियां करतलगत हो जाएंगी,  अर्थात अपने-आप ही मिल जाएंगी| राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार| तुलसी भीतर बाहेरहूं जौं चाहसि उजिआर|| प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि तू अन्दर और बाहर दोनों तरफ ज्ञान का प्रकाश (लौकिक एवं पारमार्थिक ज्ञान) चाहता है तो मुखरूपी दरवाजे की दहलीज पर रामनामरूपी मणिदीप रख दे, अर्थात जीभ के द्वारा अखण्ड रूप से श्रीरामजी के नाम का जप करता रहे| हियं निर्गुन नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम| मनहुं पुरट संपुट लसत तुलसी ललित ललाम|| प्रस्तुत दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं कि ह्रदय में निर्गुण ब...

bhakti

भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया॥ राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी॥  श्री रघुनाथजी भक्ति के विशेष अनुकूल रहते हैं। इसी से माया, भक्ति से अत्यंत डरती रहती है, जिसके हृदय में उपमारहित और उपाधिरहित विशुद्ध रामभक्ति सदा बिना किसी बाधा (रोक-टोक) के बसती है। उस भक्ति को देखकर माया सकुचा जाती है, पर वह अपनी प्रभुता नहीं चला सकती। बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥ ब्राह्मण, गो, देवता और संतों के लिए भगवान ने मनुष्य का अवतार लिया। वे  माया और उसके गुण और इंद्रियों से परे हैं। उनका  शरीर अपनी इच्छा से ही बना है॥ जौं प्रसन्न प्रभो मो पर नाथ दीन पर नेहु। निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु॥108 ख॥ भावार्थ ( ब्राह्मण  ने कहा-) हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और हे नाथ! यदि इस दीन पर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणों की  भक्ति  देकर फिर दूसरा वर दीजिए॥108 (ख)॥ होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।। मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।।  जो छल छोड़कर औ...