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Showing posts from April, 2021

योग का ज्ञान

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मृत्यु से भय होना, अर्थात् ‘मैं कभी भी न मरूँ, सर्वदा जीवित रहूँ'-इस प्रकार की भावना को 'अभिनिवेश' कहते हैं। इस 'अभिनिवेश' की वृत्ति में यह विचार अन्तर्निहित रहता है कि 'आत्मा विनाशशील है’। इसी को अन्धतामिस्र कहते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश-ये पाँच भेद विपर्यय के हैं, जिन्हें योगशास्त्र ( २।३ )में बताया है, ये विपर्यय या  पंचक्लेश कहे  जाते  हैं।  उन्हीं के अन्य नाम हैं - तमस्, मोह, महामोह, तामिस्र, अन्धतामिस्र । सांख्यदर्शन-३/३७ जो वस्तु अपने अनुकूल प्रतीत होती है, उसमें राग की भावना होती है, और जो वस्तु अपने प्रतिकूल प्रतीत होती है, उसमें द्वेष की भावना होती है। यह रागात्मिका, तथा द्वेषात्मिका वृत्ति, योग मार्ग में बाधक होती है। इन्हीं को क्रमशः महामोह और तामिस्र कहते हैं।  राग=महामोह द्वेष=तामिस्र There is a feeling of raga in the thing which seems favorable to it, and there is a feeling of malice in the object which seems unfavorable.  This ragamatika, and hostility  The instinct impedes the path of yoga.  These are called M...

भक्ति का महत्व

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सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥ भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥  भवार्थ:- वह भक्ति स्वतंत्र है, उसको ज्ञान-विज्ञान आदि किसी दूसरे साधन का सहारा अपेक्षा नहीं है। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे अनुज! भक्ति अनुपम एवं सुख की मूल है; और वह तभी मिलती है, जब संत प्रसन्न होते हैं। That devotion is independent, it does not expect recourse to any other means like knowledge and science.  Knowledge and science are subject to that.  Hey Anuj!  Devotion is the root of unique and happiness;  And she meets only when the saints are happy . जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा॥ सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी॥ भवार्थ:- हे प्रभु आप अगम और सुगम हैं निर्मल स्वभाव हैं विषम और सम हैं और सदा शांत हैं। योगी बहुत साधन करने आप को देख पाते हैं। तीनों लोकों के स्वामी रमानिवास श्री राम निरंतर अपने दासों के वश में रहते हैं। आप मेरे हृदय में निवास करें आप...

धर्म का ज्ञान

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ये वा पापं न कुर्वन्ति कर्मणा मनसा गिरा । निक्षिप्तदण्डा भूतेषु दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ अर्थ:- जो मन , वाणी और क्रियाद्वारा कभी पाप नहीं करते हैं और किसी भी प्राणीको कष्ट नहीं पहुंचाते हैं , वे भी संकट से पार हो जाते हैं।  #महाभारत पुरुष जननेन्द्रिय से , पैरों , से जो कुछ पाप कर्म किये रहता है , जो कुछ पाप बाहों से , अथवा मन से या वाणी से किये होता है , उन सभी पापों से सायंकालीन सन्ध्या करने पर मुक्त हो जाता हे। इसी प्रकार प्रातःकालीन संध्योपासना कर रात्रि में किये गये पापों से पुरुष मुक्त हो जाता है। - बौधायनधर्मसूत्र Whatever sins are committed by the male genitals, feet, whatever sins are committed.  It is done with the arms, or with the mind, or by speech, you are freed from all those sins by evening evening.In the same way, a man is freed from sins committed in the night by worshiping in the morning. वेदविहीन ब्राह्मणोंको दिया हुआ दान अपात्रदोषसे निरर्थक हो जाता है।  जो ब्राह्मण वेदज्ञानसे शून्य और शास्त्रज्ञानसे रहित होता हुआ भी दूसरोंमें दोष नहीं देखता तथा संतु...

भक्त हनुमान की वंदना

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रक्षश्चयैकचितकक्षकपूश्चिचतौ यः सीताशुचो निजविलोकनतो मृतायाः। दाहं व्यधादिव तदन्त्यविधेयभूतं, लाङ्गूलदत्तदहनेन मुदे स नोऽस्तु॥ अर्थ:- जिन्होंने सीता जी की पीड़ा को,जो उनके दर्शन मात्र से मर चुकी थी,एकमात्र राक्षस-समूह रूप काठ-कबाड़ो से बनी हुई लंकारूपिणी चिता पर सुलाकर,अपनी पूँछ की लगायी हुई अग्नि से उसका मरणान्त कालोचित दाह-संस्कार किया, वे हनुमान जी मेरी प्रसन्नता के कारण हैं।  मैं महावीर श्री हनुमान जी को प्रणाम करता हूँ। Who put the torment of Sita ji, who had died only by her vision, on the lankarupini pyre made of lath-junk, the only demon-group form, cremated her mortal with the fire of her tail, Hanuman ji  The reasons are to my delight. I bow to Mahavir Shri Hanuman. मनोजवं मारुततुल्यवेगं  जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं  श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये॥ अर्थ:- जिनकी मन के समान गति और वायु के समान वेग है, जो परम जितेन्दिय और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन पवनपुत्र वानरों में प्रमुख श्रीरामदूत की मैं शरण लेता हूं। कलियुग में ह...

भगवान का अवतरण उत्सव

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नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥ मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥ भावार्थ- पवित्र चैत्र का महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्ल पक्ष और भगवान का प्रिय अभिजित मुहूर्त था। दोपहर का समय था। न बहुत सर्दी थी, न धूप (गरमी) थी। वह पवित्र समय सब लोकों को शांति देनेवाला था। It was the month of the holy Chaitra, the Navami date.  Shukla Paksha and the beloved of God was Abhijit Muhurta.  It was the afternoon time.  It was neither very cold nor sunny.  That holy time was to give peace to all the realms.  भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी. हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी. लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी. भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी. भवार्थ:- राम चरित मानस की इन चौपाईयों का अर्थ है कि दीनों पर दया करने वाले, कौसल्याजी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए है. यानी भगवान राम ने जन्म ले लिया है. मुनियों के मन को हरने वाले, उनके अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से भर गई हैं. नेत्रों को आनंद देने वाला मेघ के समा...

महार्षि वाल्मीकि के वचन रामचरितमानस में

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जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥ भवार्थ:- महर्षि वाल्मीकि ने कहा हे राम जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है| Maharishi Valmiki said, O Ram, who never needs anything and whoever has a natural love for you, abide in his mind constantly, that is your own home.

भक्त विभीषण के वचन रामचरितमानस में

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तब लगि हृदयँ बसत खल नाना।  लोभ मोह मच्छर मद माना॥ जब लगि उर न बसत रघुनाथा।  धरें चाप सायक कटि भाथा॥ भावार्थ: (विभीषण जी श्रीरामचन्द्र जी से कहते हैं - हे प्रभु!) लोभ, मोह, मत्सर (डाह), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभी तक हृदय में बसते हैं, जब तक कि धनुष-बाण और कमर में तरकस धारण किए हुए श्री रघुनाथजी हृदय में नहीं बसते।  (Vibhishan ji says to Shri Ram Chandra ji - O Lord!) Many wicked, covetousness, temptation, matsar (jealousy), item and man etc. settle in the heart as long as Shri Raghunath ji holding the bow and arrow and waist.  Do not reside in the heart. ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥ तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥ भावार्थ :-ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेष रूपी उल्लुओं को सुख देने वाली है। वह (ममता रूपी रात्रि) तभी तक जीव के मन में बसती है, जब तक प्रभु (आप) का प्रताप रूपी सूर्य उदय नहीं होता॥ Mamata is a full dark night, which will give pleasure to the owls in the form of raga and malice.  That (Mamata-...

भगवान के वचन रामचरितमानस मे

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भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥ प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥ भवार्थ:- भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण को समझाया मैं भक्ति के साधन विस्तार से कहता हूँ- यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं। पहले तो ब्राह्मणों के चरणों में अत्यंत प्रीति हो और वेद की रीति के अनुसार अपने-अपने (वर्णाश्रम के) कर्मों में लगा रहे॥ Lord Shri Ram explained to Lakshmana, I say in detail the means of devotion - this is a smooth path, through which the creatures are able to find me easily.  First, there should be a lot of love at the feet of the Brahmins and according to the Vedas, they are engaged in their deeds (of Varnashrama). होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि॥ मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही॥ भावार्थ- भगवान श्री राम ने कहा, जो छल छोड़कर और निष्काम होकर रामेश्वर की सेवा करेंगे, उन्हें शंकर मेरी भक्ति देंगे और जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्र से तर जाएगा। B...

तुलसीदास के वचन रामचरितमानस मे

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नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥  भावार्थ - कलियुग में राम का नाम कल्पतरु और कल्याण का निवास है, जिसको स्मरण करने से भाँग-सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसी के समान (पवित्र) हो गया॥  In Kali Yuga, the name of Rama is the abode of Kalpataru and Kalyan, on remembering it, Bhang-sa (inferior) Tulsidas became (holy) like Tulsi. राम भगति मनि उर बस जाके दुख लवलेस न सपनेहुँ ताके। चतुर सिरोमनि तेइ जग माही जे मनि लागि सुजतन कराही।। अर्थ:- श्री राम भक्ति रूपी मणि,जिस हृदय बसे,उसे स्वप्न मे भी लेशमात्र दुख नही,चराचर जगत मे वही मानव चतुर शिरोमणि है जो उस भक्ति रत्न पाने का यत्न करते है। Lord Rama's devotional gem, the heart that is inhabited, does not have even the least grief in the dream, in the world of Chachar, it is the same clever man who strives to get that devotional gem. फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥ कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥ भावार्थ तुलसीदास जी कहते है,  माया  की प्रेरणा से का...

भक्त हनुमान का पराक्रम

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जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥ भावार्थ जिस पर्वत पर हनुमान जी पैर रखकर चले (जिस पर से वे उछले), वह तुरंत ही पाताल में धँस गया। जैसे श्री रघुनाथजी का अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमान जी चले॥ The mountain on which Hanuman ji walked with feet (from which he sprung), he immediately got trapped in the hull.  Just as Shri Raghunathji's unfailing arrow moves, similarly Hanuman ji walks away.