योग का ज्ञान
मृत्यु से भय होना, अर्थात् ‘मैं कभी भी न मरूँ, सर्वदा जीवित रहूँ'-इस प्रकार की भावना को 'अभिनिवेश' कहते हैं। इस 'अभिनिवेश' की वृत्ति में यह विचार अन्तर्निहित रहता है कि 'आत्मा विनाशशील है’। इसी को अन्धतामिस्र कहते हैं। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश-ये पाँच भेद विपर्यय के हैं, जिन्हें योगशास्त्र ( २।३ )में बताया है, ये विपर्यय या पंचक्लेश कहे जाते हैं। उन्हीं के अन्य नाम हैं - तमस्, मोह, महामोह, तामिस्र, अन्धतामिस्र । सांख्यदर्शन-३/३७ जो वस्तु अपने अनुकूल प्रतीत होती है, उसमें राग की भावना होती है, और जो वस्तु अपने प्रतिकूल प्रतीत होती है, उसमें द्वेष की भावना होती है। यह रागात्मिका, तथा द्वेषात्मिका वृत्ति, योग मार्ग में बाधक होती है। इन्हीं को क्रमशः महामोह और तामिस्र कहते हैं। राग=महामोह द्वेष=तामिस्र There is a feeling of raga in the thing which seems favorable to it, and there is a feeling of malice in the object which seems unfavorable. This ragamatika, and hostility The instinct impedes the path of yoga. These are called M...