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Showing posts from August, 2022

वरुण मुद्रा क्या है

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वरुण मुद्रा क्या है :- यह मुद्रा जल की कमी से होने वाले सभी तरह के रोगों से हमें बचाती है । हमारा शरीर पाँच तत्वों से मिलकर बना है। जब हमारे शरीर में जल और वायु तत्व का संतुलन बिगड़ जाता है तो हमें वात और कफ संबंधी रोग होने लगतें हैं। इन सभी रोगों से बचने के लिए वरुण मुद्रा की जाती है। पृथ्वी मुद्रा के लाभ  :- शरीर के अस्थि संस्थान एवं मांसपेशियों को यह मजबूत बनाती है। ... शरीर में विटामिनों की कमी को दूर करती है , जिसमें हमारी ऊर्जा बढती है और चेहरे पर चमक आती है। पृथ्वी मुद्रा  से जीवन शक्ति का विस्तार होता है। ... शरीर में स्फूर्ति , कान्ति और तेजस्व बढ़ता है। इस  मुद्रा  से आंतरिक प्रसन्नता का आभास होता है । सूर्य मुद्रा के फायदे इसे सूरज की  मुद्रा  के रूप में भी जाना जाता है। इससे शरीर के तापमान को बनाये रखने और दृष्टि को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। ... यह शरीर में ताप उत्पन्न करता है। ... आपके शरीर में मेटाबॉलिज्म को बढ़ाती है। आपके शरीर में पाचन में मदद करती है। आपकी बॉडी में फैट कंटेंट को घटाती है। ...

वैराग्य (Vairagy)

धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥ जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥ धर्म  से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्ष का देने वाला है- ऐसा वेदों ने वर्णन किया है। और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देनेवाली है | भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भभयं मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाभयम् । शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ।। (- वैराग्यशतकम् ३१ ) ( अर्थ - भोग करने पर रोग का भय, उच्च कुल मे जन्म होने पर बदनामी का भय, अधिक धन होने पर राजा का भय, मौन रहने पर दैन्य का भय, बलशाली होने पर शत्रुओं का भय, रूपवान होने पर वृद्धावस्था का भय, शास्त्र मे पारङ्गत होने पर वाद-विवाद का भय, गुणी होने पर दुर्जनों का भय, अच्छा शरीर होने पर यम का भय रहता है। इस संसार मे सभी वस्तुएँ भय उत्पन्न करने वालीं हैं। केवल वैराग्य से ही लोगों को अभय प्राप्त हो सकता है।) स्वयं की जाती- एक ही जाती का होना। चौपाई ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज स...

शिवाष्टोत्तरशतनाम_स्तोत्रम्

शिवाष्टोत्तरशतनाम_स्तोत्रम् शान्ताकारं शिखरिशयनं नीलकण्ठं सुरेशं।  विश्वधारं स्फटिकसदृशं शुभ्रवर्णं शुभाङ्गम्।। गौरीकान्तं त्रितयनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं।  वन्दे शम्भुं भवभयहरं सर्वलोकैक नाथम्॥   ॐ शिवो महेश्वरः शम्भुः पिनाकी शशिशेखरः।  वामदेवो विरूपाक्षः कपर्दी नीललोहितः।। 

जबतक रोग न मिटे, श्रद्धापूर्वक जप करते रहे

"अच्युताय नमः,अनन्ताय नमः,गोविन्दाय नमः" इस मन्त्र के निरन्तर जप से समस्त रोग दूर हो जाते हैं। जबतक रोग न मिटे, श्रद्धापूर्वक जप करते रहे। इस मन्त्र के सतत जप से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं। यह अनुभूत प्रयोग है। ~ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीनिरंजनदेवतीर्थजी महाराज  अच्युताय नमः- जो कभी चुय्त नहीं होते (अविनाशी)। गोविन्दाय नमः-जिनकी सत्ता से इन्द्रियाँ विचरण करती हैं। अनंताय नमः- जिसकी सत्ता से शक्ति, सामर्थ्य व कृपा का कोई अंत नहीं। इस मंत्र से अभिमंत्रित करके गंगा जल या तुलसी के पत्ते खाएं या दूसरों को दें। अच्युताय गोविन्दाय अनन्ताय नामभेषजाम् नश्यन्ति सर्व रोगाणि सत्यं सत्यं वदाम्यह्म्।

भगवान राम का रथ।

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'जो कठोर बात कह देने पर भी कुपित नहीं होते थे,दूसरों के मनमें क्रोध उत्पन्न करनेवाली बातें नहीं बोलते थे,जो सभी रूठे हुए व्यक्तियों को मना लिया करते थे वे श्रीराम वन को चले जाएंगे,हमारे महाराज की बुद्धि मारी गई है।'अंतःपुर की रानियाँ क्रंदन करने लगीं।  -रामायण२.२०.४-६.  नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना।। सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना।।  विभिशण ने रामजी से कहा, हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है, न जूते ही हैं। वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जाएगा? कृपानिधान श्री रामजी ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे सर्वदा विजय होती है, वह रथ तो दूसरा ही होता है॥ सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥ बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥  शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं॥ ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥ द...

श्रीकृष्णजन्मस्तुतिः

।। श्रीकृष्णजन्मस्तुतिः ।। रूपं यत्तत्प्राहुरव्यक्तमाद्यं  ब्रह्मज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद्विष्णुरध्यात्मदीपः ।।१।।  नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने  महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । व्यक्ते व्यक्तं कालवेगेन याते  भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः ।।२।। योयं कालस्तस्य तेव्यक्तबन्धोश्चेष्टामाहुश्चेष्टते  येन विश्वम् । निमेषादिर्वत्सरान्तो महीयांस्तं  त्वीशानं क्षेमधाम प्रपद्ये ।।३।। मर्त्यो मृत्युव्यालभीतः  पलायन्सर्वांल्लोकान्निर्वृतिं नाध्यगच्छत् । त्वत्पादाब्जं पाप्य यदृच्छयाद्य  स्वस्थः शेते मृत्युरस्मादपैति ।।४।। इति श्रीमद्भागवते दशमस्कन्धे तृतीयाध्यायान्तर्गता                      देवकीकृता स्तुतिः                            🏵️🏵️ ॐकृष्णायनमः

श्रीविष्णुषट्पदी

श्रीविष्णुषट्पदी उद्धृतनग नगभिदनुज दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे। दृष्टे भवति प्रभवति न भवति किं भवतिरस्कारः।। मत्स्यादिभिरवतारैरवतारवताऽवता सदा वसुधाम्। परमेश्वर परिपाल्यो भवता भवतापभीतोऽहम्॥ दामोदर गुणमन्दिर सुन्दरवदनारविन्द गोविन्द। भवजलधिमथनमन्दर परमं दरमपनय त्वं मे। 

देवकीकृतम् विष्णुस्तोत्रम्

।। देवकीकृतम् विष्णुस्तोत्रम् ।। 🪷 जगतामीश्वरेशेश ज्ञानज्ञेयभवाव्यय । समस्तदेवतादेव वासुदेव नमोस्तुते ।। प्रधानपुंसोरजयोर्यः कारणमकारणम् । अविशेष्यमजं रूपं तव तस्मै नमोस्तुते ।।  त्वं प्रधानं पुमांश्चैव कारणाकारणात्मकः । सदसच्चाखिलं देव केनोक्तेन तव स्तवः ।। प्रसीद देव देवानामरिशातन वामन । लोभाभिभूता यदहं वरयामि प्रयच्छ तत् ।। ।। श्रीविष्णुधर्मेषु नवतितमोध्यायान्तर्गतं देवकीकृतं विष्णुस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

dherm

लघुत्व मूलं च किमर्थितैव गुरुत्व बीजं यदयाचनं किम् । जातो हि को यस्य पुनर्न जन्म को वा मृतो यस्य पुनर्न मृत्युः ॥ प्रश्नोत्तरी, आदि शङ्कराचार्य प्रश्न – छोटेपन की जड़ क्या है ? उत्तर– याचना , किसी के आगे हाथ फैलाना। प्रश्न – बड़प्पन की जड़ क्या है ? उत्तर –कुछ भी न माँगना, किसी के आगे हाथ न फैलाना। प्रश्न – किसका जन्म सराहनीय है ? उत्तर – जिसका पुनर्जन्म न हो । देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि। यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः।। अर्थात् देहाभिमान (जडके साथ मैं-पन) सर्वथा मिट जानेपर जब परमात्मतत्त्वका बोध हो जाता है, तब जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहाँ-वहाँ परमात्मतत्त्वका अनुभव होता है अर्थात् उसकी अखण्ड समाधि (सहज समाधि) रहती है। नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥ सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥ भावार्थ:-हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान्‌ वीर रावण किस प्रकार जीता जाएगा?कृपानिधान श्री रामजी ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है॥ सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥ ब...

आंखों के अंदर तिल

  सतर्कwhat does mole on eyes indicateआंखों के अंदर तिलकई लोगों के तिल आंखों के अंदर भी होता है। समुद्र शास्त्र की माने तो ऐसे व्‍यक्ति का स्‍वभाव समझ पाना थोड़ा मुश्किल होता है। ऐसे लोग अपनी बातों को मन में दबा कर ही रखते हैं।जिन लोगों की आंखों के अंदर तिल होता है उन्हें भविष्य में होने वाली घटनाओं का आभास पहले ही हो जाता है। ऐसे लोगों की बताई हुई बातें अमूमन सच साबित हो जाती हैं।जिस व्यक्ति के आंखों के अंदर तिल होता है वह मन के साफ होते हैं। ऐसे लोगों में व्यक्ति को समझने की क्षमता अच्छी होती है। साथ ही यह रिश्तों को निभाने में विश्वास रखते हैं। जिन महिलाओं की आंखों के अंदर तिल होता है, उन्हें जीवन में खुशियां तो मिलती हैं मगर इसके लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ता है। वहीं जिन पुरुषों की आंखों के अंदर तिल होता है, उनका भाग्‍य हमेशा उनका साथ देता है। दाहिनी आंख पर तिल होने का मतलब क्या है?  जिन लोगों की दाहिनी आंख के आसपास तिल होता है वो बहुत अमीर होते हैं.   उनके आर्थिक हालात भी बहुत अच्छे होते हैं .  अगर आपके माथे के दाहिनी ओर तिल है तो आपके पास धन हमेशा बढ़ता रहेगा।...

yoga

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Principles of Yog  - 3 granthis There are three granthis (psychic knots) in the physical body which are obstacles on the path of the awakened kundalini. The granthis are called brahma, vishnu and rudra, and they represent levels of awareness where the power of maya, ignorance  and attachment to material things is especially strong. Each aspirant must transcend these barriers to make a clear passageway for the ascending kundalini.  1. Brahma granthi functions in the region of mooladhara chakra. It implies attachment to physical pleasures, material objects and excessive selfishness. It also implies the ensnaring power of tamas - negativity, lethargy and ignorance. 2. Vishnu granthi operates in the region of anahata chakra. It is associated with the bondage of emotional attachment and attachment to people and inner psychic visions. It is connected with rajas - the tendency towards passion, ambition and assertiveness. 3. Rudra granthi functions in the region of ajna chakra. I...

naam mahima

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राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥ यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा॥  जो लोग राम-राम कहकर जँभाई लेते हैं, अर्थात आलस्य से भी जिनके मुँह से राम-नाम का उच्चारण हो जाता है, पापों के समूह उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुह को तो स्वयं श्री रामचन्द्रजी ने हृदय से लगा लिया और कुल समेत इसे जगत्पावन (जगत को पवित्र करने वाला) बना दिया॥ राम त्वत्तोऽधिकं नाम इति मे निश्चिता मतिः। त्वयैका तारिताऽयोध्या नाम्ना तु भुवनत्रयम् ॥ प्रभो! आपका नाम तो आपसे बहुत ही श्रेष्ठ है, ऐसा मैं बुद्धि से निश्चयपूर्वक कहता हूँ, क्योंकि आपने तो केवल अयोध्यावासियों को तारा है, परंतु आपका नाम तो सदा-सर्वदा तीनों भुवनों को तारता ही रहता है। चौपाई काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही॥ नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया॥4॥ भावार्थ जिसका  श्री रघुनाथ जी  के चरणों में अत्यंत प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते। हे पक्षीराज! नट (बाजीगर) का किया हुआ कपट चरित्र (इंद्रजाल) देखने वालों के लिए बड़ा विकट (दुर्गम) होता है, पर नट के स...

अयोध्या की प्राचीन कथा। Story of Ayodhya

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Skip to content August 5, 2022         MENU अयोध्या की प्राचीन कथा। Story of Ayodhya by  Ajit Kumar Mishra September 7, 2020 अयोध्या की प्राचीन कथा क्या है? किसने बसाई अयोध्या नगरी? क्यों पुराणों मेंअयोध्या को 7 सबसे पवित्र नगरों में एक माना जाता है ? किसने अयोध्या नगर की स्थापना की थी ? अयोध्या किस वंश ने सर्वप्रथम शासन किया था?। अयोध्या नगर में ही विष्णु ने श्रीराम के रुप में अवतार क्यों लिया था ?अयोध्या के पवित्र सरयू नदी का क्या महत्व है ? कैसे स्थापित हुआ अयोध्या का वैभव और कैसे खत्म हो गई अयोध्या ? यह एक प्राचीन कथा है जिसका श्रवण करने वालों को अखंड पुण्य की प्राप्ति होती है ।  Table of Contents अयोध्या की प्राचीन कथा के अनुसार मनु ने इसकी स्थापना की थी : अयोध्या का जिक्र उपनिषदों में भी है : महाभारत में अयोध्या का जिक्र : दक्षिण भारत के ग्रंथो में अयोध्या की चर्चा : कश्मीर मे अयोध्या का वर्णन : रामचरितमानस में अयोध्या : रामचरितमानस में रामराज्य का वर्णन : वाल्मीकि रामायण में रामराज्य का वर्णन :   अयोध्या की प्राचीन कथा के अनु...