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Showing posts from July, 2023

राम-भरोसो एक से फायदे

https://youtu.be/vfjdij4n9GA ‘तुलसी’ साथी विपति के, विद्या, विनय, विवेक।  साहस, सुकृत, सुसत्य-व्रत, राम-भरोसो एक॥  गोस्वामी जी कहते हैं कि विद्या, विनय, ज्ञान, उत्साह, पुण्य और सत्य भाषण आदि विपत्ति में साथ देने वाले गुण एक भगवान् राम के भरोसे से ही प्राप्त हो सकते हैं।

real progress

https://youtu.be/vfjdij4n9GA

रघु वीर का यस

https://www.hindwi.org/poets/tulsidas/दोहे किष्किंधा कांड के समापन में एक दोहा है- 'भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिंजे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।। '  श्री रघुवीर का यश भवरूपी रोग (जन्म-मरण) की अचूक दवा है । जो पुरुष-स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथ सिद्ध करेंगे।

नाम मे रुचि बढ़ाने का उपाय

नाम गरीबनिवाज को, राज देत जन जानि। तुलसी मन परिहरत नहिं, धुरविनिआ की वानि॥ तुलसीदास कहते हैं कि गरीब निवाज (दीनबंधु) श्री राम का नाम ऐसा है, जो जपने वाले को भगवान का निज जन जानकर राज्य (प्रजापति का पद या मोक्ष-साम्राज्य तक) दे डालता है। परंतु यह मन ऐसा अविश्वासी और नीच है कि घूरे (कूड़े के ढेर) में पड़े दाने चुगने की ओछी आदत नहीं छोड़ता (अर्थात् गदे विषयो में ही सुख खोजता है)। https://www.hindwi.org/poets/tulsidas/dohe तुलसी’ साथी विपति के, विद्या, विनय, विवेक। साहस, सुकृत, सुसत्य-व्रत, राम-भरोसो एक॥ गोस्वामी जी कहते हैं कि विद्या, विनय, ज्ञान, उत्साह, पुण्य और सत्य भाषण आदि विपत्ति में साथ देने वाल...

अव गुण मिटने केउपय्

चौपाई निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥ कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥4॥ भावार्थ निज-सुख (आत्मानंद) के बिना क्या मन स्थिर हो सकता है? वायु-तत्त्व के बिना क्या स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वास के बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? इसी प्रकार श्री हरि के भजन बिना जन्म-मृत्यु के भय का नाश नहीं होता॥४॥ चौपाई निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥ कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥4॥ भावार्थ निज-सुख (आत्मानंद) के बिना क्या मन स्थिर हो सकता है? वायु-तत्त्व के बिना क्या स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वास के बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? इसी प्रकार श्री हरि के भजन बिना जन्म-मृत्यु के भय का नाश नहीं होता॥४॥ https://youtu.be/k0BSwgI0diw

भगवान वाद & surrender

https://youtu.be/TUrvht6wSqU ऐसे वर को क्या वरु, जो जनमे और मर जाये वरीय गिरिधर लाल को, चोलो अमर हो जाये

तुलसी के दोहे

https://www.hindwi.org/poets/tulsidas/dohe नाम गरीबनिवाज को, राज देत जन जानि। तुलसी मन परिहरत नहिं, धुरविनिआ की वानि॥ तुलसीदास कहते हैं कि गरीब निवाज (दीनबंधु) श्री राम का नाम ऐसा है, जो जपने वाले को भगवान का निज जन जानकर राज्य (प्रजापति का पद या मोक्ष-साम्राज्य तक) दे डालता है। परंतु यह मन ऐसा अविश्वासी और नीच है कि घूरे (कूड़े के ढेर) में पड़े दाने चुगने की ओछी आदत नहीं छोड़ता (अर्थात् गदे विषयो में ही सुख खोजता है)। राम नाम रति राम गति, राम नाम बिस्वास।  सुमिरत सुभ मंगल कुसल, दुहुँ दिसि तुलसीदास॥  तुलसीदास कहते हैं कि जिसका राम नाम में प्रेम है, राम ही जिसकी एकमात्र गति है और राम नाम में ही जिसका विश्वास है, उसके लिए राम नाम का स्मरण करने से ही दोनों ओर (इस लोक में और परलोक ...

हनुमान दास पर वचन

सकल अंग पद - बिमुख नाथ मुख नामकी ओट लई है । है तुलसिहिं परतीति एक प्रभु - मूरति कृपामई है ॥७॥ हे प्रभो ! ( इस प्रकार ) मेरे सभी अंग आपके चरणोंसे विमुख हैं । केवल इस मुखसे आपके नामकी ओट ले रखी है ( और यह इसलिये कि ) तुलसीकी एक यही निश्चय है कि आपकी मूर्ति कृपामयी है । ( आप कृपासागर होनेके कारण , नामके प्रभावसे मुझे अवश्य अपना लेंगे ) ॥७॥ https://youtu.be/ubgBwVhrk9g यों मन कबहूँ तुमहिं न लाग्यो । ज्यों छल छाँड़ि सुभाव निरंतर रहत बिषय अनुराग्यो ॥१॥ ज्यों चितई परनारि , सुने पातक - प्रपंच घर - घरके । त्यों न साधु , सुरसरि - तरंग - निरमल गुनगन रघुबरके ॥२॥ ज्यों नासा सुगंधरस - बस , रसना षटरस - रति मानी । राम - प्रसाद - माल जूठन लगि त्यों न ललकि ललचानी ॥३॥ चंदन - चंदबदनि - भूषन - पट ज्यों चह पाँवर परस्यो । त्यों रघुपति - पद - पदुम - परस को तनु पातकी न तरस्यो ॥४॥ ज्यों सब भाँति कुदेव कुठाकुर सेये बपु बचन हिये हूँ । त्यों न राम सुकृतग्य जे सकुचत सकृत प्रनाम किये हूँ ॥५॥ चंचल चरन लोभ लगि लोलुप द्वार - द्वार जग बागे । राम - सीय - आस्त्रमनि चलत त्यों भये न स्रमित अभागे ॥६॥ सकल अंग पद - बिमुख नाथ मु...

साधना के विघ्न और उपाय क्या करे?

साधना के विघ्न और उपाय क्या करे? जीवन में उन्नति के तीन मार्ग कहे गये है  ज्ञान, कर्म और भक्ति #thread 1: ज्ञान में होश है 2: कर्म में उपलब्धि 3: और भक्ति में समर्पण है अतः तीनों ही जीवन को पूर्णता की ओर ले जाते हैं पर मानव को तो कर्म करने का ही अधिकार मिला है और वास्तव में यह बहुत बड़ा अधिकार है इसके चार भाग भाव, इच्छा, कर्म और फल इन सभी का शोधन योग का विषय है।  साधना काल में हम बहिमुर्खता से अंतमुर्खता में  जब आते हैं और आत्म स्वरूप अवस्था ग्रहण करते हैं। साधना में सफलता प्राप्ति सहज नहीं होती अनेक विघ्न आते.... साधना के विघ्न और उपाय ..... विघ्नों को दूर करने के उपाय 1.तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाSभ्यास: योग के उपरोक्त विघ्नों के नाश के लिए  एक तत्त्व ईश्वर का ही अभ्यास करना चाहिए ॐ का जप करने से ये विघ्न शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। 2. मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुख दुःख  पुण्यापुण्य विषयाणां भावनातश्चित्त प्रसादनम्  सुखी जनों से मित्रता, दु:खी लोगों पर दया, पुण्यात्माओं में हर्ष और पापियों की उपेक्षा की भावना से चित्त स्वच्छ हो जाता है और विघ्न शांत होते है...

श्री षडक्षर स्तोत्रम्

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श्री षडक्षर स्तोत्रम् - ॐ कारं बिंदुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिन:। कामदं मोक्षदं चैव ॐ काराय नमो नमः।।१।। नमंति ऋषयो देवा नमन्त्यप्सरसां गणा:। नरा नमंति देवेशं नकाराय नमो नमः।।२।। महादेवं महात्मानं महाध्याय परायणम्। महापापहरं देवं मकाराय नमो नमः।।३।।

पैर दर्द(ortho) और सर्विकल् , skin drynes releif

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प्राण मुद्रा (नेत्र & consentration)

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गणेश चलीसा

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Menu श्री गणेश चालीसा हिन्दी अर्थ सहित- Shri Ganesh Chalisa In Hindi January 14, 2022   by  Jagurukta श्री गणेश चालीसा हिन्दी अर्थ सहित- Shri Ganesh Chalisa In Hindi ॥ Jai Ganapati Sadguna Sadan ॥ Table of Contents Ganesh Chalisa गणेश जी की आराधना के लिए  श्री गणेश चालीसा (Shri Ganesh Chalisa) का पाठ करना चाहिए। श्री गणेश चालीसा (Shri Ganesh Chalisa in Hindi) ॥दोहा॥ जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥ अर्थ:- हे सद्गुणों के सदन भगवान श्री गणेश आपकी जय हो, कवि भी आपको कृपालु बताते हैं। आप कष्टों का हरण कर सबका कल्याण करते हो, माता पार्वती के लाडले श्री गणेश जी महाराज आपकी जय हो। ॥चौपाई॥ जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥ अर्थ:- हे देवताओं के स्वामी, देवताओं के राजा, हर कार्य को शुभ व कल्याणकारी करने वाले भगवान  श्री गणेश जी  आपकी जय हो, जय हो, जय हो। क्या आप जानते... Play Unmute Loaded:  100.00% Remaining Time  - 0:27 Fullscreen क्या आप जानते हैं पुरुषों की तुलना में महिलाओं के कपड़ों म...

chakra & mudra

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वायु मुद्रा (तर्जनि अंगुली)

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अगुथा - आग midile finger- अकाश anamika- earth littile finger- जल 

हृदय मुद्रा का तरीका

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ह्रदय मुद्रा का अभ्‍यास करने से ब्‍लड प्रेशर कंट्रोल रहेगा और हार्ट को ऑक्‍सीजन सप्‍लाई करने में कोई अड़चन नहीं आएगी।    हार्ट की मांसपेश‍ियों को मजबूत बनाने में मदद म‍िलती है। ह्रदय मुद्रा की मदद से हार्ट अटैक, स्‍ट्रोक, कोरोनरी धमनी रोग, एनजाइना जैसी गंभीर बीमार‍ियां से बचने में मदद म‍िलती है। ह्रदय मुद्रा का अभ्‍यास करने से द‍िमाग को शांत करने और तनाव को कम करने में मदद म‍िलती है। जोड़ों, गर्दन, स‍िर, पीठ में होने वाले दर्द को दूर करने के ल‍िए ह्रदय मुद्रा फायदेमंद मानी जाती है।    ह्रदय मुद्रा करने से अस्‍थमा और माइग्रेन के लक्षणों को कंट्रोल क‍िया जा सकता है। पाचन क्र‍िया को बेहतर बनाने में भी ह्रदय मुद्रा का योगदान रहता है।  अन‍िद्रा की समस्‍या दूर करने में मदद म‍िलती है।

“राम” मन्त्र

🚩“राम” मन्त्र 🚩 र', 'अ' और 'म', इन तीनों अक्षरों के योग से 'राम' मंत्र बनता है। यही राम रसायन है। 'र' अग्निवाचक है। 'अ' बीज मंत्र है। 'म' का अर्थ है ज्ञान। यह मंत्र पापों को जलाता है, किंतु पुण्य को सुरक्षित रखता है और ज्ञान प्रदान करता है। हम चाहते हैं कि पुण्य सुरक्षित रहें, सिर्फ पापों का नाश हो। 'अ' मंत्र जोड़ देने से अग्नि केवल पाप कर्मो का दहन कर पाती है। और हमारे शुभ और सात्विक कर्मो को सुरक्षित करती है। 'म' का उच्चारण करने से ज्ञान की उत्पत्ति होती है। हमें अपने स्वरूप का भान हो जाता है। इसलिए हम र, अ और म को जोड़कर एक मंत्र बना लेते हैं-राम। 'म' अभीष्ट होने पर भी यदि हम 'र' और 'अ' का उच्चारण नहीं करेंगे तो अभीष्ट की प्राप्ति नहीं होगी। राम सिर्फ एक नाम नहीं अपितु एक मंत्र है, जिसका नित्य स्मरण करने से सभी दु:खों से मुक्ति मिल जाती है। राम शब्द का अर्थ है- मनोहर, विलक्षण, चमत्कारी, पापियों का नाश करने वाला व भवसागर से मुक्त करने वाला। रामचरित मानस के बालकांड में एक प्रसंग में लिखा है- ...

(ānanda Rāmāyaṇ, Sarga 7)

Shri Krishna says :- There is no such mantra that is even equal to Ram naam which can give both wealth and moksh.  This is self illuminated and avytakt.The one who who recites the Name of Rāma, Becomes Rāma swaroop, as Told by śrī Rāma to śrī Hanūmāna ~(ānanda Rāmāyaṇ, Sarga 7)

अपने वास्तविक स्वरूप की खोज को भक्ति कहा गया है।

मुक्ति के लिए सहायक वस्तुओं में भक्ति ही सर्वोच्च स्थान रखती है और अपने वास्तविक स्वरूप की खोज को भक्ति कहा गया है।

ब्रम्हचार्य का मतलब

ब्रह्म्च्र्य् का मतलब  ब्रह्म की तरह बनना (सक्चि भाव में रहना) 6 विकार रहित  1. ईर्ष्या  2. काम 3. क्रोध   4. मद  5. ला ल्च् 6. मोह जितेन्द्रिय् बनो 

राहु से मुक्ति (मोर का पंख)

https://stories.app.goo.gl/vtrD

मुक्ति के प्रकार

https://youtu.be/6O2Brc85Xeo भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ, देवताओ के हितके लिये श्रीरामचन्द्रजी मनुष्यशरीर धरकर लीलाएँ की, जिनके सुननेमात्रसे जगत्के सारे जंजाल कट जाते है॥ देवता, पृथ्वी, गौ व ब्राह्मणो की रक्षा के लिये भगवान्  स्वेच्छा से अवतार धारण करते है, (किसी कर्मबन्धन से नही)। वहीं सगुण स्वरूपके उपासक भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, साष्टि और सायुज्य सभी प्रकारके मोक्ष का त्याग कर परिकररूप से उनके साथ रहते है॥

यम और नियम

https://youtu.be/adpFvZjc5Sc यम 1. सत्य 2. अहिंसा 3. अस्तेय (इच्छा ना करना किसी के पास होने पर) 4. ब्रह चर्या 5 अ परी ग्रह (किसी से कुछ नहीं लेना) लेने से हीन भावना आती हे जो बन्धन का कारण है। नियम 1. तप (व्रत उपवास ) 2. स्वधय् ( वेद पाठ, मन्त्र उच्चारण) 3. सौच् (अन्दर और बाहर) 4. सन्तोष 5. ईस्वर परी धान (भक्ती)

एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।277।

कोउ बिश्राम कि पव तात सहज संतोष बिनु। चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।275। सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल। अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।276। एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास।277।  जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास। तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस।278। https://youtu.be/gVs9I8lw3NQ चातक तुलसी के मतें स्वातिहुँ पिऐ न पानि। प्रेम तृषा बाढ़ति भली घटें घटैगी आनि।279। रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग । तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रूचि रंग।280। जो चेतन कह जड़ करइ, जड़हि करइ चैतन्य। अस समर्थ रघुनाथ कहि, महिं जीव ते धन्य॥ जो चेतन को जड़ कर देते हैं और जड़ को चेतन, ऐसे समर्थ श्री रघुनाथ जी को जो जीव भजते हैं वे धन्य हैं।

शुक्रनीति ४.३.६६

पृथक् पृथक् क्रियाभिर्हि कलाभेदस्तु जायते । यां यां कलां समाश्रित्य तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ - शुक्रनीति ४.३.६६ कलाओं का आश्रय लेकर लोग जीविका चलाते हैं, उस कला के नाम से उनकी जो पहचान होती है, उसे जाति कहते हैं।

संसार को कैसे छोड़े

https://youtu.be/9_Fjxl8hGkU

राम नाम गुणों का खजाना है साबका हेतू है।

https://youtu.be/0TY2FMkFV6M इति रामो विग्रहवान् स्वयं ब्रह्म सनातनः । आत्माराम चिदानन्दो भक्तानुग्रहकारकः ।। श्रीराम स्वयं मूर्तिमान् सनातन ब्रह्म है। वे चिदानन्द- स्वरूप आत्मा में ही रमण करने वाले तथा भक्तों पर अनुम करने वाले भक्तवत्सल है..!!

भग्वत् प्रप्ति मे असली गलती

https://youtu.be/vbfnuPI6gMM

हमारा उद्धार नाम जप ही कर देगा

भरोसो जाहि दूसरो सो करो। मोको तो रामको नाम कलपतरु, कलिकल्यान फरो॥1॥ करम उपासन ग्यान बेदमत सो जब भाँति खरो। मोहिं तो सावनके अंधहि ज्यों, सूझत हरो-हरो॥2॥ चाटत रहेउँ स्वान पातरि ज्यों कबहुँ न पेट भरो। सो हौं सुमिरत नाम-सुधारस, पेखत परुसि धरो॥3॥ स्वारथ औ परमारथहूको, नहिं कुञ्जरो नरो। सुनियत सेतु पयोधि पषनन्हि, करि कपि कटक तरो॥4॥ प्रीति प्रतीति जहाँ जाकी तहॅं, ताको काज सरो। मेर तो माय-बाप दोउ आखर, हौं सिसु-अरनि अरो॥5॥ संकर साखि जो राखि कहउँ कछु, तौ जरि जीह गरो। अपनो भलो रामनामहिं ते, तुलसिहि समुझि परोो॥६ https://youtu.be/vbfnuPI6gMM

मनुष्य का दुख का कारण

https://youtu.be/a_1PVtKHqdM

गणेश गीता

••|| गणेश गीता ||•• गणेश गीता गणेश पुराण के क्रिया खंड के अंतर्गत कुल ग्यारह अध्यायों में विस्तृत है।  यह सर्वप्रथम भगवान गणेश द्वारा राजा वरेण्य को दी गई ब्रह्म विद्या की शिक्षाओं का वर्णन करता है, जिसे व्यासजी ने आदि सिद्ध योग कहा है। इसे सुनकर राजा को मुक्ति की प्राप्त हुई। इस परम ज्ञान को व्यास जी ने सूत जी को सुनाया, फिर क्रमशः ऋषि शौनक और शुकदेव जी को प्राप्त हुआ। इसमें उपदेशों के जो विषय है वो लगभग भगवद गीता के समान ही हैं। यहां कर्म योग, सांख्य योग,भक्ति योग, योग साधना, प्राणायाम, मानस पूजा, सगुनोपासना, विभुयोग, दर्शन जैसे अन्य महत्वपूर्ण विषयों का भी ऊल्लेख है।गणपति महाराज के विश्वव्यापी स्वरूप, त्रिविध प्रकृति और उसके अनुसार जीव की गति के बारे में बताया गया है, जो साधन और तत्वज्ञान की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी है। इस गीता के अंत में इसके पाठ और ध्यान के महत्व का भी वर्णन किया गया है। इसकी कई टीकाएँ संस्कृत और मराठी में पाई जा सकती हैं। श्रेय:गीता संग्रह की पुस्तक

भागवत प्राप्ति में समय का उपयोग

https://youtu.be/yZXR-nZ03Gs https://youtube.com/shorts/XMLqlknVtz4?feature=share त्रिशूला कि  https://youtu.be/6O2Brc85Xeo

यथान्तरं न भेदाः स्युः शिवकेशवयोस्तथा

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शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे । शिवस्य हृदयं विष्णुः विष्णोश्च हृदयं शिवः ॥॥ यथा शिवमयो विष्णुरेवं विष्णुमयः शिवः । यथान्तरं न पश्यामि तथा मे स्वस्तिरायुषि ॥॥ यथान्तरं न भेदाः स्युः शिवकेशवयोस्तथा ।Skandopaniṣat 🙏🏻

विनय पत्रिका

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हिम तम-करि-केहरि करमाली। दहन दोष दुख दुरित रूजाली। कोक कोकनद लोक प्रकासी। तेज प्रताप रूप् रस-रासी। दीन दयालु दिवाकर देवा। कर मुनि, मनुज, सुरासुर सेवा।। हिम तम-करि-केहरि करमाली। दहन दोष दुख दुरित रूजाली। कोक कोकनद लोक प्रकासी। तेज प्रताप रूप् रस-रासी। सारथि-पंगु, दिब्य रथ गामी। हरि संकर बिधि मूरति स्वामी। बेद पुरान प्रगट जस जागै। तुलसी राम-भगति बर मांगै। हे दीनदयालु भगवान् सूर्य! मुनि, मनुष्य, देवता व राक्षस सभी आपकी सेवा करते हैं॥ आप पाले और अन्धकाररूपी हाथियों को मारने वाले वनराज सिंह है, किरणों की माला पहने रहते हैं, दोष, दुःख, दुराचार और रोगों को भस्म कर डालते है॥ रात के बिछुड़े चकवा-चकवियों को मिलवाकर प्रसन्न करने वाले। कमल को खिलाने वाले, समस्त लोको को प्रकाशित करते है। तेज, प्रताप, रूप और रसकी आप खान है॥ आप दिव्य रथपर चलते है, आपके सारथी अरुण पंगु है। हे स्वामी आप विष्णु, शिव, ब्रह्मा के ही रूप हैं॥ वेद-पुराणो मे आपकी कीर्ति जगमगा रही है। तुलसीदास आपसे श्रीरामभक्ति का वर माँगता है।विनय पत्रिका

श्रीमद्भागवत तृत्तीय श्रॅखला, तृत्तीय स्कन्ध, अध्याय २८|२९

प्रत्येक कल्प और अनुकल्प में यह संपूर्ण मायावी संसार किससे प्रकट होता है, किसमें निवास करता है और अंत समय में किसमें पुनः लीन हो जाता है, इस दृश्य जगत से सर्वथा भिन्न है, जिसका ध्यान करके ऋषियों को शाश्वत मोक्ष की प्राप्ति होती है। शाश्वत, शुद्ध, गतिहीन और सर्वव्यापी भगवान हैं, मैं पुरुषोत्तम (जगन्नाथजी) को नमस्कार करता हूं।जो शुद्ध है, आकाश के समान निष्कलंक है, नित्य आनंदमय है, नित्य सुखी है, पवित्र है, सबका स्वामी है, निर्गुण है, व्यक्त और अव्यक्त से परे है, सांसारिकता से मुक्त है, प्रत्यक्ष है और ध्यान में सर्वव्यापी है, इस रूप में विद्वान पुरुष ध्यान करते हैं समाधि के समय पर संसार है जो सृष्टि की उत्पत्ति और विनाश के एकमात्र कारण हैं, जिन्हें बुढ़ापा भी छू नहीं सकता और जो मोक्ष प्रदान करने वाले हैं, उन भगवान श्रीहरि की पूजा करो। श्रीमद्भागवत तृत्तीय श्रॅखला, तृत्तीय स्कन्ध, अध्याय २८|२९ 

rahu ke 5 bhav aur 11 bhav ketu

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स्वरविज्ञान और ज्योतिष शास्त्र

स्वर विज्ञान एक रहस्य...... योगी होना कोई आसान कार्य नहीं है परन्तु क्यूँ? #thread स्वरविज्ञान और ज्योतिष शास्त्र मानव  शरीर पंचतत्त्वों का बना हुआ ब्रह्माण्ड का ही एक छोटा स्वरूप है। ईश्वर की असीम कृपा से जन्म के साथ ही मानव को स्वरोदय-ज्ञान मिला है। यह विशुद्ध वैज्ञानिक आध्यात्मिक ज्ञान-दर्शन है, प्राण ऊर्जा है, विवेक शक्ति है। संसार के सब जीवों में से मनुष्य ही एकमात्र कर्म योनि है। शेष सब भोग योनियाँ हैं। स्वर-साधना से ही हमारे  ऋषि-मुनियों आदि ने अनुभव से भूत, भविष्य और वर्तमान को जाना है। अब यह मनुष्य के हाथों में है कि इस स्वरोदय- विज्ञान का कितना उपयोग और उपभोग करता है। भारतीय ज्योतिषशास्त्र में अंक-ज्योतिष, स्वप्न-ज्योतिष, स्वरोदय-ज्योतिष, शकुन-ज्योतिष, सामुद्रिक-हस्तज्योतिष, शरीरसर्वांगलक्षण ज्योतिष आदि पर अनेकानेक ग्रन्थ हैं। इन सबमें अति प्राचीन, तत्काल प्रभाव और परिणाम देने वाला स्वरोदय-विज्ञान है।मनुष्य की नासिका में दो छिद्र हैं-दाहिना और बायाँ। दोनों छिद्रों में से केवल एक छिद्र से ही वायु का प्रवेश और बाहर निकलना होता रहता है। दूसरा छिद्र बन्द रहता है। जब दूसर...

जप करते समय नींद क्यूँ आती है?

𝘄𝗵𝘆 𝗳𝗲𝗲𝗹 𝘀𝗹𝗲𝗲𝗽𝘆 𝗱𝘂𝗿𝗶𝗻𝗴 𝗰𝗵𝗮𝗻𝘁𝗶𝗻𝗴 𝗻𝗮𝗮𝗺 𝗷𝗮𝗽𝗮 #thread जप करते समय नींद क्यूँ आती है?  जप करते समय निद्रा आवेश भी अक्सर हो सकता है। निद्रा, तन्द्रा, योगनिद्रा तीन तरह के लक्षण प्रकट होते हैं। जप कते समय जब अन्दर के षट्चक्रों पर दबाव पड़ता है तो शक्ति अन्दर से बाहर की ओर आती है तो मांसपेशियों पर दबाव पड़कर थकान महसूस होती है। लेकिन उस समय उर्जा भी उत्पन्न होती है जो राहत पहुंचाती है तो निद्रा आती है। तन्द्रा में थकान महसूस नहीं होती है, शरीर कुछ हल्का होने लगता है, प्राणवायु का स्पन्दन आगे बढ़ने लगता है तो भोहों पर दबाव पड़ता है। तब कुछ समय के लिये पलकें बन्द होने लगती है। तन्मयता से जप करते समय या स्तोत्र पाठ करते समय भावुकता बढ़ती है। हृदय कमल पर दबाव पड़ता है तो बुद्धि एवं चित्त पर उर्ध्वगमन वायु का प्रभाव बढ़ता है, शरीर विचार शून्य होने लगता है परन्तु शरीर को स्तोत्र पाठ हेतु जागरुक रखना पड़ता है आँखों के हीरे ऊपर की ओर घूमने लगने जैसा आभास होता है। चित्त को जबरदस्ती खींचते रहने पर ही स्तोत्र पाठ संभव है। अगर मन्त्र जाप करते हैं तो नन्मयता योगनिद्रा...

ॐ हनुमते नमः

" श्रीमन्नारदीय भगवत निकुंज " *...हनुमान जयंती...* ॐ हनुमते नमः जयति मंगलागार, संसारभारापहर, वानराकारविग्रह पुरारी । राम - रोषानल - ज्वालमाला - मिष ध्वांतचर - सलभ - संहारकारी ॥ जयति मरुदंजनामोद - मंदिर, नतग्रीव सुग्रीव - दुःखैकबंधो । यातुधानोद्धत - क्रुद्ध - कालाग्निहर, सिद्ध - सुर - सज्जनानंद - सिंधो ॥ जयति रुद्राग्रणी, विश्व - वंद्याग्रणी, विश्वविख्यात - भट - चक्रवर्ती । सामगाताग्रणी, कामजेताग्रणी, रामहित, रामभक्तानुवर्ती ॥ जयति संग्रामजय, रामसंदेसहर, कौशला - कुशल - कल्याणभाषी । राम - विरहार्क - संतप्त - भरतादि - नरनारि - शीतलकरण कल्पशाषी ॥ जयति सिंहासनासीन सीतारमण, निरखि, निर्भरहरष नृत्यकारी । राम संभ्राज शोभा - सहित सर्वदा तुलसिमानस - रामपुर - विहारी ॥ हे हनुमानजी ! तुम्हारी जय हो । तुम कल्याणके स्थान, संसारज्के भारको हरनेवाले, बन्दरके आकारमें साक्षात् शिवस्वरुप हो । तुम राक्षसरुपी पतंगोंको भस्म करनेवाली श्रीरामचन्द्रजीके क्रोधरुपी अग्निकी ज्वालामालाके मूर्तिमान् स्वरुप हो ॥ तुम्हारी जय हो । तुम पवन और अंजनी देवीके आनन्दके स्थान हो । नीची गर्दन किये हुए, दुःखी सुग्रीवके द...

अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर जगत् मेरे स्वामी भगवान् का रूप है॥

सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥ समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ॥  हे कपि! सुनो, मन में ग्लानि मत मानना।तुम मुझे लक्ष्मण से भी दूने प्रिय हो।सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं पर मुझको सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति होता है॥ सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥3॥ और हे हनुमान्! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर जगत् मेरे स्वामी भगवान् का रूप है॥

जप विधि

https://youtu.be/0mk0qdoEkgA

कैसे पहचाने प्रभु को ?

https://youtu.be/vIAFfN9tXaM भक्ती से सब जगह  विवेक से असत्य

सत्य सनातन का कीर्तन-विज्ञान

सत्य सनातन का कीर्तन-विज्ञान #thread  हमारे सनातन धर्म के ग्रन्थों में कीर्तन, जप एवं नामस्मरण की महिमा का बड़ा ही महत्वपूर्ण वर्णन है, विशेषकर इस कलि-काल जैसे विकराल समय के लिए इन्हें अचूक रामबाण कहा गया है। यथा-  मर्त्या अमर्तस्य ते भूरि नाम मनामहे । (ऋग्वेद ८।११।५) तथा- कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः ।  कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंग: परं ब्रजेत् ॥  कृते यद् ध्यायतो विष्णु सेतायां यजतो मर्वः ।  द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ॥  ( श्रीमद् भाग० १२ । ३।५१-५२ )  अर्थात् 'राजन् ! दोषों के भण्डार इस कलियुग में यह एक महान् गुण है कि इसमें भगवान् का कीर्तन मात्र करने से ही पुरुष सब प्रकार की आसक्तियों से मुक्त होकर परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। सतयुग में विष्णु के ध्यान, त्रेता में यज्ञ तथा द्वापर में पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है वह सब कलियुग में श्रीहरि नाम कीर्तन से ही मिल जाता है । गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है- नहि कलि करमन भगति वियेकू ।  राम नाम अवलंबन एकू ॥ तथा- कृतजुग सेवा द्वापर पूजा मख अरु जोग ।  जो गति होय सो क...